स्वर्ग की रानी प्रार्थना के पूर्व संदेश देते संत पापा फ्राँसिस स्वर्ग की रानी प्रार्थना के पूर्व संदेश देते संत पापा फ्राँसिस 

स्वर्ग की रानी प्रार्थना ˸ प्रेम का मतलब सेवा करना न कि नियंत्रण

रविवार को स्वर्ग की रानी प्रार्थना के पूर्व अपने संदेश में संत पापा फ्राँसिस ने येसु के प्रेम में दृढ़ बने रहने के अर्थ पर चिंतन किया तथा कहा कि इसका इजहार दूसरों की सेवा में अपने आपको अर्पित करते हुए किया जा सकता है।

उषा मनोरमा तिरकी-वाटिकन सिटी

वाटिकन सिटी, रविवार, 9 मई 2021 (रेई)- वाटिकन स्थित संत पेत्रुस महागिरजाघर के प्रांगण में रविवार 9 मई को, संत पापा फ्राँसिस ने भक्त समुदाय के साथ स्वर्ग की रानी प्रार्थना का पाठ किया जिसके पूर्व उन्होंने विश्वासियों को सम्बोधित कर कहा, अति प्रिय भाइयो एवं बहनो, सुप्रभात।

इस रविवार के सुसमाचार पाठ (यो.15,9-17) में येसु, अपने आपकी तुलना दाखलता से और हमारी तुलना डालियों से करने के बाद, बतलाते हैं कि उनके साथ संयुक्त रहने के बाद हम क्या फल ला सकते हैं ˸ यह फल है प्रेम का। मूल शब्द के रूप में वे फिर से संयुक्त रहने को लेते हैं। वे निमंत्रण देते हैं कि हम उनके प्रेम में दृढ़ बने रहें ताकि उनका आनन्द हममें हो और हमारा आनन्द परिपूर्ण हो जाए। (पद. 9,11) येसु के प्रेम में दृढ़ बने रहना।

पिता के प्रेम को जानना

संत पापा ने कहा, "हम अपने आप से पूछे ˸ यह कौन सा प्रेम है जिसमें येसु बने रहने को कहते हैं ताकि उनके आनन्द को प्राप्त किया जा सके? किस तरह का प्रेम है? यह प्रेम पिता से उत्पन्न होता है क्योंकि ईश्वर प्रेम हैं (1 यो. 4,8) और यह ईश्वर का प्रेम है, पिता का जो नदी के समान उनके पुत्र येसु में बहता है और उनके द्वारा हम, उनकी सृष्टि में आता है। वास्तव में वे कहते हैं ˸ "जिस तरह पिता ने मुझको प्यार किया है, उसी प्रकार मैं भी तुमको प्यार करता हूँ।" (यो.15,9) जो प्रेम येसु प्रदान करते हैं उसी प्रेम से पिता ने उन्हें प्रेम किया है। विशुद्ध, बेशर्त, मुफ्त में दिया गया प्रेम। इसे खरीदा नहीं जा सकता, यह मुफ्त हैं। इसको देते हुए येसु हमसे मित्र की तरह वर्ताव करते हैं- इस प्रेम के द्वारा वे पिता को प्रकट करते हैं और दुनिया के जीवन के लिए अपने ही मिशन में शामिल करते हैं।  

एक दूसरे को प्यार करना

संत पापा ने कहा, "हम कैसे इस प्रेम में बने रह सकते हैं?" येसु कहते हैं, "यदि तुम मेरी आज्ञाओं का पालन करोगे, तो मेरे प्रेम में दृढ़ बने रहोगे।"(10)

हम सवाल कर सकते हैं, इस प्रेम में कैसे सुदृढ़ रहा जा सकता है? येसु कहते है ˸ यदि तुम मेरी आज्ञाओं का पालन करोगे, तो मेरे प्रेम में दृढ़ बने रहोगे। (10) येसु अपनी आज्ञाओं को संक्षेप में इस तरह प्रस्तुत करते हैं ˸ "एक-दूसरे को प्यार करो जैसे मैंने तुम्हें प्यार किया है।" (12) येसु ख्रीस्त के समान प्रेम करने का अर्थ है अपने आपको सेवा में लगाना, भाई-बहनों की सेवा करना, जैसा कि उन्होंने अपने शिष्यों के पैर धोये। अर्थात् अपने आपसे बाहर निकलना, अपनी मानवीय सुरक्षा, दुनियावी सुख- सुविधा से अनासक्त होना ताकि दूसरों के प्रति उदार हो सकें, खासकर, जिन्हें अधिक आवश्यकता है। इसका अर्थ है हम जो हैं और हमारे पास जो है उससे दूसरों की मदद करना। मतलब कि प्रेम करना शब्दों से नहीं बल्कि कार्यों से (फल से)।

सेवा, हिंसा अथवा नियंत्रण नहीं

ख्रीस्त के समान प्रेम करने का अर्थ है दूसरे प्रकार के प्रेम को "न" कहना, जिनको दुनिया प्रस्तुत करती है ˸ धन से प्रेम – जो धन को प्यार करता है वह येसु के समान प्रेम नहीं करता, उपलब्धियों से प्रेम, शक्ति के लिए घमंड...ये रास्ते प्रेम के लिए भ्रामक होते हैं। वे प्रभु के प्रेम से दूर कर देते और हमें स्वार्थी, संकीर्णतावादी और अभिमानी बना देते हैं। और उदण्डता हमें उस तरह के प्रेम की ओर ले जाता है जो दूसरों का शोषण करता, प्रेम के पात्र को दुःख देता है। संत पापा ने कहा, "मैं उस 'बीमार प्रेम' के बारे सोचता हूँ जो हिंसा में बदल जाता है। कितनी महिलाएँ आज हिंसा की शिकार हैं। यह प्रेम नहीं है। प्रभु ने हमें जैसा प्रेम किया, वैसा प्रेम करने का अर्थ है हमारे नजदीक रहनेवाले लोगों की प्रशंसा करना, उनकी स्वतंत्रता का सम्मान करना, वे जैसे है वैसे ही प्यार करना, न कि अपनी पसंद की खोज करना, मुफ्त में प्यार करना।" अंततः येसु हमें अपने प्रेम में दृढ़ बने रहने के लिए कहते हैं, उनके अनुसार प्रेम करने, न कि हमारे विचार अनुसार, अपने आपकी पूजा करने के लिए नहीं। जो अपने खुद की इच्छा पूर्ति के लिए जीता है वह दर्पण में जीता है...हमेशा अपने आपको देखता। वे हमें दूसरों को नियंत्रण में रखने एवं दूसरों को अपने इशारे पर चलाने के बहाने से बाहर निकलने के लिए कहते हैं। संत पापा ने कहा, दूसरों की जाँच न करें बल्कि उनकी सेवा करें। अपने हृदय को दूसरों के लिए खोलें, यही प्रेम है विश्वास करना एवं अपने आपको दूसरों को देना है।

आनन्द का साक्ष्य

प्यारे भाइयो एवं बहनो, प्रभु के साथ दृढ़ बने रहना हमें कहाँ ले जाता है? यह हमें किधर प्रेरित करता है? येसु हमें बतलाते हैं ˸ ताकि मेरा आनन्द तुम में हो और तुम्हारा आनन्द परिपूर्ण हो जाए। (11) प्रभु के पास आनन्द है क्योंकि वे पूरी तरह पिता से संयुक्त हैं, और वे चाहते है कि उनसे संयुक्त होकर हम भी उस आनन्द को प्राप्त करें। इस बात को जानने का आनन्द कि हमारी बेवफाई के बावजूद ईश्वर हमें प्यार करते हैं, हमें जीवन की तकलीफों का सामना विश्वास के साथ करने के लिए प्रेरित करता है। बेहतर तक पहुँचने के लिए संकट को पार करने देता है। इस आनन्द को जीना हमारा सच्चा साक्ष्य है क्योंकि आनन्द ही एक सच्चे ख्रीस्तीय का वास्तविक चिन्ह है। एक सच्चा ख्रीस्तीय उदास नहीं होता, उसमें वह आनन्द हमेशा रहता है, अंधकारमय समय में भी।

संत पापा ने प्रार्थना की कि कुंवारी मरियम हमें येसु के प्रेम में दृढ़ बने रहने और पुनर्जीवित प्रभु के आनन्द का साक्ष्य देते हुए सभी के प्रति प्रेम में बढ़ने में मदद दे।

इतना कहने के बाद संत पापा ने भक्त समुदाय के साथ स्वर्ग की रानी प्रार्थना की पाठ किया तथा सभी को अपना प्रेरितिक आशीर्वाद दिया।

स्वर्ग की रानी प्रार्थना के पूर्व संत पापा का संदेश

 

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09 May 2021, 15:13

स्वर्ग की रानी क्या है?

स्वर्ग की रानी गीत (अथवा स्वर्ग की रानी) मरियम के चार गीतों में से एक है (अन्य तीन गीत हैं- अल्मा रेदेनतोरिस मातेर, आवे रेजिना चेलोरूम, प्रणाम हे रानी)।

संत पापा बेनेडिक्ट 15वें ने सन् 1742 में, पास्का काल अर्थात् पास्का रविवार से लेकर पेंतेकोस्त तक, देवदूत प्रार्थना के स्थान पर इसे खड़े होकर गाने का निर्देश दिया था जो मृत्यु पर विजय का प्रतीक है।

देवदूत प्रार्थना की तरह इसे भी दिन में तीन बार किया जाता है, प्रातः, मध्याह्न एवं संध्या ताकि पूरे दिन को ख्रीस्त एवं माता मरियम को समर्पित किया जा सके।

एक धार्मिक परम्परा के रूप में यह पुरानी गीत छटवीं से दसवीं शताब्दी की हो सकती है, जबकि इसके प्रसार को 13वीं शताब्दी में दस्तावेज के रूप पाया गया है जब इसे फ्राँसिसकन दैनिक प्रार्थना में शामिल किया था। यह चार छोटे पदों से बना है जिनमें हरेक का अंत अल्लेलूया से होता है। इस प्रार्थना में विश्वासी मरियम को स्वर्ग की रानी सम्बोधित करते हैं कि वे पुनर्जीवित ख्रीस्त के साथ आनन्द मनायें।   

संत पापा फ्राँसिस ने 6 अप्रैल 2015 को ठीक स्वर्ग की रानी प्रार्थना के दौरान पास्का के दूसरे दिन बतलाया था कि इस प्रार्थना को करते समय हमारे हृदय में किस तरह का मनोभाव होना चाहिए।

...हम मरियम की ओर निहारें और उन्हें आनन्द मनाने का निमंत्रण दें क्योंकि वे ही हैं जिन्होंने उन्हें गर्भ में धारण किया था वे अब जी उठे हैं जैसा कि उन्होंने प्रतिज्ञा की थी और हम उनकी मध्यस्थता द्वारा प्रार्थना करें। वास्तव में, हमारा आनन्द माता मरियम के आनन्द का प्रतिबिम्ब है क्योंकि वे ही हैं जिन्होंने विश्वास के साथ येसु की देखभाल की और उनका लालन-पालन किया। अतः आइये, हम भी इस प्रार्थना को बाल-सुलभ मनोभाव से करें जो इसलिए प्रफूल्लित होते हैं क्योंकि उनकी माताएँ आनन्दित होते।"   

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