लिजनरीस ऑफ ख्राइस्ट से पोप : धार्मिक अधिकार सेवा है, शासन नहीं
वाटिकन न्यूज
वाटिकन सिटी, बृहस्पतिवार, 19 फरवरी 2026 (रेई) : पोप लियो 14वें ने बृहस्पतिवार को लिजनरीस ऑफ ख्राईस्ट धर्मसंघ की महासभा के प्रतिभागियों से मुलाकात की। धर्मसंघ की स्थापना मेक्सिको में 1941 हुई थी।
अपने सम्बोधन में पोप ने कहा कि महासभा धर्मसंघियों को पवित्र आत्मा की बात सुनने और समुदाय में समझदारी से काम करने का मौका देती है, ताकि भविष्य में समुदाय को मार्गदर्शन दिया जा सके।
उन्होंने कहा कि ऐतिहासिक व्यंजना और ठोकर मिलने के बावजूद, जिनसे दर्द और संकट पैदा हुए, लिजनरीस को कलीसिया के अंदर एक करिश्मा मिला है।
पोप लियो ने धर्मसंघ के सदस्यों को प्रोत्साहन दिया कि वे अपने इतिहास को याद रखें और सुसमाचार के प्रति वफादार रहने के लिए लगातार नवीनीकरण लाने कोशिश करें। उन्होंने कहा कि उनका कारिश्म (जो एक लोकधर्मी आंदोलन है) कलीसिया और ख्रीस्त के राज्य के आध्यात्मिक परिवार के लिए एक “कीमती योगदान” देता है।
उन्होंने कहा, “एक कारिज्म पवित्र आत्मा का वरदान होता है।” “अपनी पहचान को गहरा करने की लगातार प्रक्रिया में हर संस्था और उसके हर सदस्य को इसे व्यक्तिगत और समुदाय में अपनाने के लिए बुलाया जाता है, जो उन्हें कलीसिया और समाज में जगह देती और उन्हें परिभाषित करती है।”
उन्होंने आगे कहा, फिर भी, हर कारिज्म में जीवन के अलग-अलग रूप और शैली होते हैं, जिनका स्वागत किया जाना और आत्मपरख करना चाहिए ताकि ईश्वर के बुलावे को निष्ठा से जी सकें।
उन्होंने कहा, “याद रखें कि आप कारिज्म के मालिक नहीं हैं, बल्कि उसके रखवाले और सेवक हैं।” “आपको अपना जीवन देने के लिए बुलाया गया है ताकि यह उपहार कलीसिया और दुनिया में फलदायी बना रहे।”
पोप लियो 14वें ने लीजनरीस ऑफ क्राइस्ट के अधिकारों को यह याद दिलाने के लिए आमंत्रित किया कि धर्मसंघी जीवन में अधिकारियों को आम जीवन की सेवा करनी चाहिए और समुदाय के सदस्यों का ध्यान ख्रीस्त पर केंद्रित करना चाहिए, साथ ही “ऐसे हर तरह के नियंत्रण से बचना चाहिए जो लोगों की गरिमा और स्वतंत्रता का सम्मान नहीं करता।”
उन्होंने कहा, “धर्मसंघी जीवन में अधिकार का मतलब दबदबा नहीं, बल्कि उन लोगों के लिए आध्यात्मिक और भ्रातृत्वपूर्ण सेवा है जिनकी बुलाहट एक जैसा है।” “इसका इस्तेमाल ‘साथ देने की कला’ में होना चाहिए।”
उन्होंने कहा कि धर्मसंघी नेताओं को ऐसा शासन करना चाहिए जिसमें “एक दूसरे को सुनना, मिलकर जिम्मेदारी लेना, पारदर्शिता, भ्रातृत्वपूर्ण सामीप्य और आपसी समझदारी” हो।
पोप ने आगे कहा कि शासन के अच्छे तरीके सभी सदस्यों की एकता और जिम्मेदार भागीदारी को बढ़ावा देते हैं।
उन्होंने कहा कि मिशनरी एकता का मतलब एक जैसा होना और मतभेदों को खत्म करना नहीं है, बल्कि यह अलग-अलग तरह के लोगों और मतभेदों में तालमेल बिठाना है ताकि सभी को लाभ हो सके।
उन्होंने कहा, “यह प्रक्रिया में सुनने की विनम्रता, ईमानदारी से बोलने के लिए आंतरिक स्वतंत्रता एवं एक जैसी समझ को स्वीकार करने के लिए खुलेपन की जरूरत होती है।” “यह हर उस काम की आंतरिक मांग है जिसे समुदाय में जिया जाता है।”
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