संत पापा लियोः बपतिस्मा में हम सब एक हैं
वाटिकन सिटी
संत पापा लियो 14वें ने अपने बुधवारीय आमदर्शन समारोह के अवसर पर संत पेत्रुस महागिरजाघर के प्रांगण में एकत्रित सभी विश्वासियों और तीर्थयात्रियों का अभिवादन करते हुए कहा, प्रिय भाइयो एवं बहनों, सुप्रभात।
धर्मसिद्धांत लुमेन जेन्सियुम के अनुरूप हम कलीसिया पर चिंतन जारी रखते हैं। आज हम इसके चौथे अध्याय पर अवलोकन करेंगे जो लोकधर्मियों के बारे में जिक्र करता है। हम सब संत पापा फ्रांसिस के इस बात को याद करें, “लोकधर्मी, साधारण शब्दों में, ईश्वर की बहुसंख्यक प्रजा है।” उनकी सेवा में हम- अभियंजित पुरोहितों- अल्पसंख्यकों को पाते हैं।”
लोकधर्मियों का सार
दस्तावेज का यह भाग, सकारात्मक रूप में हमारे लिए लोकधर्मियों की प्रेरितिक प्रकृति की चर्चा करता है, जहाँ हम उन्हें वर्षों बाद उस रूप में परिभाषित पाते हैं जो याजकीय या समर्पित जीवन के अंग नहीं हैं। इसी कारण से, संत पापा ने कहा कि मैं आप लोगों के संग उस सुन्दर पद को पुनः पढ़ना चाहूँगा जो हमारे लिए ख्रीस्तीय होने की महानता को व्यक्त करता है- “अतः चुनी हुई प्रजा एक है- एक ईश्वर, एक विश्वास, एक बपतिस्मा” (ऐफि.4.5)। इसके फलस्वरुप येसु ख्रीस्त में नवीन बनाये गये सदस्यों स्वरुप, हम उनकी संतान एक ही कृपा और बुलाहट को साझा करते हैं जो हमें उनमें मिलने वाली मुक्ति के भागीदार बनाता है, हम अपने लिए एक मुक्ति, एक आशा और एक विभाजनरहित प्रेम को पाते हैं।
बपतिस्मा में समानता
संत पापा ने कहा कि किसी एक विशेष प्रेरिताई या जीवन के पहले, धर्मसभा हमारे लिए इस बात को सुनिश्चित करती है कि बपतिस्मा प्राप्त लोगों के रुप में हम सभी एक हैं। धर्मसभा हमें इस बात को नहीं भूलने को कहती है जिसकी चर्चा उसने ईश प्रजा के अध्याय में, पहले ही किया है, अर्थात मुक्ति प्राप्त ईश्वरीय प्रजा के रुप में हम मानवीय सम्मान और स्वतंत्रता को अपने में धारण करते हैं।
अतः निश्चित रूप में उपहार की महानता, हमारे उत्तरदायित्व को और भी बृहृद बनाती है। इसी कारण से, धर्मसभा, मानवीय सम्मान के साथ कलीसिया और विश्व में लोकधर्मियों की प्रेरिताई पर भी बल देती है। लेकिन इस प्रेरिताई की नींव क्या है और हम इसमें किस बात को निहित पाते हैंॽ “यहाँ हम लोकधर्मियों के अर्थ को सब विश्वासियों के रुप में समझते हैं...जो बपतिस्मा के कारण ईश्वर के एक शरीर का अंग बनते और ईश्वरीय प्रजा का निर्माण करते हैं। वे स्वयं अपने में ख्रीस्त की पुरोहिताई, नबूवत और राजकीय प्रजा के कार्यो को साझा करते हैं, और वे स्वयं अपनी ओर से कलीसिया और विश्व के लिए सारे ख्रीस्तीयों की प्रेरिताई को पूरा करते हैं।”
ईशप्रजा भीड़ नहीं, ख्रीस्त का शरीर
संत पापा ने कहा कि ईश्वर की पवित्र प्रजा, इस भांति, अपने में कभी भी एक आकारविहीन लोगों की भीड़ नहीं है, बल्कि यह ख्रीस्त का शरीर है, जैसे कि संत अगुस्टीन कहते हैं, ख्रीस्तुस तोतुस- यह व्यवस्थित रूप से संरचित एक समुदाय है जो मसीह की पुरोहिताई में भागीदारी होने वाले दो रूपों - ख्रीस्त की सामान्य पुरोहिताई और अभियंजित प्रेरिताई, के बीच फलदायी संबंध से निर्मित है। बपतिस्मा के आधार पर, लोकधर्मी ख्रीस्त की उसी पुरोहिताई के भागीदार होते हैं। वास्ताव में, सर्वशक्तिमान और दिव्य पुरोहित, येसु ख्रीस्त, चूंकि वे इस बात की चाह रखते हैं कि उनका साक्ष्य और सेवा लोकधर्मियों के द्वारा भी जारी रहे, इसके लिए वे उन्हें पवित्र आत्मा से सजीव बनाते और निरंतर हर भले और श्रेष्ठ कार्य के लिए प्रोत्साहित करते हैं।”
दाखबारी में कार्य
इस संदर्भ में, हम संत पापा जोन पॉल द्वितीय और उनके प्रेरितिक उद्बोधन किस्तीफिदेलेस लाइची को कैसे भूल सकते हैंॽ इसमें वे इस बात पर जोर देते हैं कि “धर्मसभा, अपनी समृद्ध सिद्धांत, आध्यात्मिक और प्रेरितिक विरासत में, उन बातों को लिखती है जिन्हें पहले कभी भी प्रकृति, मानवीय सम्मान, अध्यात्मिकता, प्रेरिताई और लोकधर्मियों की जिम्मेदारी के बारे नहीं लिखा गया था। और धर्मसभा के आचार्य, ख्रीस्त के बुलावे को पुनः ध्वनित करते हुए, सब लोकधर्मियों, नर और नारियों को दाखबारी में मेहनत करने हेतु निमंत्रण देते हैं।” इस भांति, मेरे पूर्ववर्ती माननीय ने लोकधर्मियों की प्रेरिताई की पुनः शुरूआत की, जो धर्मसभा के एक विशेष दास्तेवज में अंकित है, जिसकी चर्चा हम बाद में करेंगे।
लोकधर्मियों की प्रेरिताई वैश्विक
संत पापा लियो ने कहा कि लोकधर्मियों की प्रेरिताई कलीसिया तक सीमित नहीं है बल्कि यह विश्व में फैली है। वास्तव में, कलीसिया हर जगह उपस्थित है जहाँ उसकी संतानें सुसमाचार पर विश्वास करते हुए उसका साक्ष्य देते हैं- कार्यस्थलों में, नागर समाज में और सारे मानवीय संबंधों में, जहाँ कहीं भी, वे अपने चुनाव के माध्यम, ख्रीस्तीय जीवन की सुन्दरता को प्रकट करते हैं, जो अभी और वर्तमान में इस तथ्य को घोषित करता है कि ईश्वर के राज्य में न्याय और शांति स्थापित होगी। विश्व को ख्रीस्त के आत्मा से भूरपूर होने की जरुरत है, और प्रभावकारी ढ़ंग से उसके उद्देश्य न्याय, प्रेम और शक्ति की स्थापना करना। और यह केवल तक संभव है जब हम सहयोग, सेवा और लोकधर्मियों के साक्ष्य को पाते हैं।
कलीसिया “बाहर जाने”
यह कलीसिया के लिए अपने से “बाहर जाने” का निमंत्रण है, जिसकी चर्चा संत पापा फ्रांसिस ने कीः कलीसिया का स्वरूप इतिहास में है, जो सदैव प्रेरिताई के लिए खुली है, जहाँ हम सब प्रेरितिक शिष्यगण, सुसमाचार के प्रेरित बनने, ईश्वरीय राज्य का साक्ष्य देने, ख्रीस्त से मिलन की खुशी को दूसरे तक लेने के लिए बुलाये गये हैं।
प्रिय भाइयो एवं बहनों, संत पापा ने कहा कि पास्का जिसे मनाने की तैयारी करने हम कर रहें हैं, हममें मरियम मगदलेना, पेत्रुस और योहन की भांति कृपा को नवीन करे जिससे हम पुनर्जीवित येसु का साक्ष्य दे सकें।
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