संत पापा लियोः धर्मविधि हमें पोषित करती है
वाटिकन सिटी
संत पापा लियो 14वें ने अपने बुधवारीय आमदर्शन समारोह की धर्मशिक्षा में साक्रोसांतुम कोनसिलियुम पर चिंतन शुरू किया।
संत पापा लियो ने संत पेत्रुस महागिरजाघर के प्रांगण में एकत्रित सभी विश्वासियों और तीर्थयात्रियों का अभिवादन करते हुए कहा प्रिय भाइयो एवं बहनों सुप्रभात और सुस्वागतम्।
आज हम द्वितीय वाटिकन महासभा के प्रथम दस्तावेज साक्रोसांतुम कोनसिलियुम, पवित्र धर्मविधि के सिद्धांत पर अपनी धर्मशिक्षा माला की एक नई श्रृखंला शुरू करेंगे।
इस धर्मसिद्धांत के अभिलेखन में, धर्मसभा के पुरोहितों ने केवल धर्मविधि में एक नवनीकरण लाने का विचार किया बल्कि कलीसिया को- ख्रीस्त के रहस्य पर चिंतन करने और उस सजीव संबंध की गहराई से विचारमंथन करने को अग्रसर किया जो उसका निर्माण करती और उसे एकता में पिरोती है। वास्तव में, धर्मविधि इस रहस्य के हृदय का स्पर्श करती है- यह हमारे लिए वह स्थल, समय और संदर्भ को व्यक्त करता है जिसे कलीसिया स्वयं येसु ख्रीस्त के जीवन से प्राप्त करती है। क्योंकि धर्मविधि में, “मुक्ति विधान के कार्य हमारे लिए परिपूर्णत को प्राप्त करते हैं”, जो हमें चुनी हुई वंशावली बनाती है, एक राजकीय पुरोहिताई, एक पवित्र राष्ट्र और एक प्रजा जिसे ईश्वर ने स्वयं अपने लिए बनाया है।
पास्का की घटनाः ख्रीस्तीय रहस्य
संत पापा ने कहा कि इसकी त्रिआयामी नवीनता- धर्मग्रंथीय, आचार्य और धर्मविधि- जिससे हो कर कलीसिया 20वीं सदी से होकर गुजरी, हमें इस बात का पता चलता है कि रहस्य का सवाल हमें एक अस्पष्ट सच्चाई को नहीं बल्कि ईश्वर की मुक्ति योजना को व्यक्त करता है, जो वर्षो तक गुप्त रहा जिसे हमारे लिए ख्रीस्त में प्रकट किया गया जैसे कि संत पौलुस हमें इसके बारे में कहते हैं। अतः यहाँ हम ख्रीस्तीय रहस्य को पाते हैं- अर्थात पास्का की घटना, कहने का अर्थ ख्रीस्त का दुःखभोग, मृत्यु और पुनरूत्थान तथा उनका महिमान्वित होना, जो हमारे लिए संस्कारीय रुप, धर्मविधि में उपस्थित रहता है, जिससे हम जब कभी समुदाय के रुप में उनके “नाम में जमा होते हैं” (मत्ती. 18.20) हम अपने को उस रहस्य में सराबोर पाते हैं।
कलीसियाई रहस्य का उद्गमः येसु ख्रीस्त
संत पापा लियो ने कहा कि ख्रीस्त स्वयं हमारे लिए कलीसियाई रहस्य के आंतरिक उद्गम हैं, ईश्वर की पवित्र प्रजा, जो क्रूस में उनके बेधित बगल से जन्मती है। पवित्र धर्मविधि में, पवित्र आत्मा की शक्ति से, वे कार्य करना जारी रखते हैं। वे अपनी वधू, कलीसिया को पवित्र करते और उसे एकता को बनाये रखते हैं, जिसके द्वारा वे अपने को पिता के लिए अर्पित करते हैं। वे अपनी अद्वितीय पुरोहिताई का उपयोग करते हैं, वे वचन की उद्घोषणा में, संस्कारों में, पुरोहितों में जो बलि अर्पित करते, एकत्रित समुदाय में और सर्वश्रेष्ट रुप में यूखारीस्त में उपस्थित रहते हैं। इस भांति, संत अगुस्टीन के अनुसार, यूख्ररीस्तीय समारोह के अनुष्ठान में कलीसिया “ईश्वर के शरीर को ग्रहण करती है और वही बन जाती जिसके वह प्राप्त करती है।” वह ख्रीस्त का शरीर बन जाती है, “पवित्र आत्मा में ईश्वर का एक निवास स्थल।” यह “हमारी मुक्ति का कार्य” है, जो हमें येसु ख्रीस्त से संयुक्त करता और हमें एकता में बनाये रखता है।
कलीसिया की पहचान
संत पापा ने कहा कि पवित्र धर्मविधि में, इस एकता की प्राप्ति “रीतियों और प्रार्थनाओं” के अनुष्ठान में होती है। रीतियों को अनुष्ठान में कलीसिया अपने विश्वास को व्यक्त करती है- जैसे कि हम उसे लेक्स ओरंदी, लेक्स क्रेदेंदी में अभिव्यक्ति पाते हैं- इसके साथ ही यह हमारे लिए कलीसियाई पहचान को व्यक्त करती है- वचन की घोषणा, संस्कारों का अनुष्ठान, प्रतीकात्मक निशानियाँ, शांति, स्थल- ये सारी चीजें पिता ईश्वर के द्वारा एकत्रित लोगों का प्रतिनिधित्व करती और उन्हें एक स्वरुप प्रदान करती जो पिता के द्वारा, ख्रीस्त का शरीर, पवित्र आत्मा का मंदिर स्वरुप एकत्रित किये जाते हैं। हर समारोह, इस भांति हमारे लिए प्रार्थना में एक सच्ची ज्योति बनती है जैसे कि संत पापा जोन पौल द्वितीय हमें याद दिलाते हैं।
यदि धर्मविधि ख्रीस्त के रहस्य की सेवा है, तो एक व्यक्ति यह समझता है कि क्यों इसे इस रूप परिभाषित किया गया है, “शिखर जिसकी ओर कलीसिया के कार्य अभिमुख हैं...स्रोत जहाँ से उसकी सारी शक्ति प्रवाहित होती हैं।” यह सच है कि कलीसिया के कार्य केवल धर्मविधि तक ही सीमित नहीं हैं, जबकि, उसके सारे क्रियाकलाप उपेदश, द्ररिद्रों की सेवा, मानवीय सच्चाईयों के संग चलना, सारी चीजें उस शिखर की ओर अभिमुख होती है। इसके विपरीत, धर्मविधि विश्वासियों का पोषण करती है उन्हें येसु ख्रीस्त के पास्का में सदैव डूबोती और उन्हें नवीन बनाती है, और इस तरह वचन की उद्घोषणा द्वारा, संस्कारों के अनुष्ठान और सामुदायिक प्रार्थना के माध्यम, वे ताजे बनाये जाते, प्रोत्साहित किये जाते और विश्वास में अपनी निष्ठा और प्रेरिताई को नवीन बनाते हैं। दूसरे शब्दों में, विश्वासियों का धर्मविधि के अनुष्ठान में सहभागिता अपने में “आंतरिक” और “वाह्य” दोनों है।
धर्मविधि का सार्थकता
संत पापा लियो ने कहा कि इसका अर्थ यह भी है कि यह हमें अपने रोज़मर्रा की ज़िंदगी में एक ठोस तरीके से, एक नैतिक और आध्यात्मिक आयाम को स्थापित करने का निमंत्रण देता है, जिससे धर्मविधि का अनुष्ठान हमारे जीवन सार्थक बनता, और यह हमसे एक निष्ठामय जीवन की मांग करता है, जिसके फलस्वरुप हमें उन बातों को ठोस बनाते हैं जिनका अनुभव हम समारोह में करते हैं- इस तरह से हमारा जीवन एक जीवित बलिदान बनता है जो पवित्र और ईश्वर को ग्रह्या होता है, जिसके द्वारा हमारी आध्यात्मिक आराधना पूरी होती है।
धर्मविधि का प्रभाव
इस तरह से, “धर्मविधि प्रतिदिन उनका निर्माण करती है जो ईश्वर के मंदिर में रहते हैं।” यह एक खुले समुदाय का निर्माण करती है जो सभों का स्वागत करते हैं। वास्तव में, यह पवित्र आत्मा का निवास है, जो हमें ख्रीस्त के जीवन से परिचय कराता है, वह हमें उनका शरीर बनाता है, उसके सभी आयामों में, यह ख्रीस्त में सारी मानव जाति की एकता को एक निशानी स्वरुप व्यक्त करता है। जैसे संत पापा फ्रांसिस ने कहा, “दुनिया इसे अभी तक नहीं जानती है, लेकिन हर किसकी को मेमने के विवाह भोज में सहभागी होने के लिए निमंत्रण दिया गया है।”
संत पापा लियो ने कहा प्रिय मित्रो, हम आंतरिक रूप से धर्मविधि के क्रिया-कलापों, चिन्हों, इसकी निशानियों और उससे भी बढ़कर धर्मविधि में ख्रीस्त की जीवित निशानी से अपनो को पोषित होने दें, जिसकी खोज करने का अवसर हमें आने वाले धर्मशिक्षाओं में मिलेगा।
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