संत पापा लियो 14वें लोकधर्मिसयों, जीवन का विकास हेतु गठित परमधर्मपीठीय सदस्यों के संग संत पापा लियो 14वें लोकधर्मिसयों, जीवन का विकास हेतु गठित परमधर्मपीठीय सदस्यों के संग  (@Vatican Media)

संत पापा लियोः लोकधर्मियों में एकता और खुलापन

संत पापा लियो 14वें ने कलीसियाई संघों, नये समुदायों को प्रोत्साहित करने वाले विश्वासियों के संघों से भेंट की और उन्हें प्रशासन पर अपना संदेश दिया।

वाटिकन सिटी

संत पापा लियो लोकधर्मी, परिवार और जीवन को प्रोत्साहन देने हेतु गठित परमधर्मपीठ के द्वारा आयोजित कलीसियाई संघों, विश्वासियों और नए समुदायों को प्रोत्साहित करने वाले संयोगजकों के संघों से भेंट की।

संत पापा ने संघों के सदस्यों का स्वागत करते हुए उन्हें अपने संबोधन में कहा कि हर सामाजिक समुदाय में कुछ लोगों और संरचनाओं की जरुरत होती है जिससे जनसामान्य जीवन संचालित किया जा सके। इस संदर्भ में निर्देशित करना “जहाज चलाना” की भांति है। अतः यह सुनिश्चित दिशा देने की ओर हमारा ध्यान आकर्षित कराता है जिससे समुदाय सदस्यों के लिए विकास का एक स्थल बनें। इस भांति कलीसिया में भी हम कुछके लोगों को प्रबंधन हेतु नियुक्त पाते हैं।

कलीसिया की स्थापना

संत पापा ने कहा कि यद्यपि कलीसिया में शासन उसके सदस्यों के लिए धार्मिक जरूरतों की पूर्ति हेतु केवल एक प्रबंधन नहीं है। “कलीसिया येसु ख्रीस्त के द्वारा एक वैश्विक मुक्ति हेतु स्थापित की गई है और यह एक वह स्थल है जहाँ हम ईश्वर की इच्छा को हर जाति और धर्मों के लोगों के लिए पाते हैं जो ख्रीस्त में मिलने वाली मुक्ति के फल को प्राप्त और अनुभव करें।” इस अर्थ में कलीसिया की प्रकृति को हम संस्कार स्वरूप पाते हैं जिसका आयाम निश्चित रुप में बाह्य औऱ संस्थागत है, इसके साथ ही हम इसे एक प्रभावकारी एकता की निशानी स्वरुप पाते हैं जिसके द्वारा हम त्रियेक ईश्वर के जीवन में सहभागी होते हैं।

संत पापा और संघ के सदस्यगम
संत पापा और संघ के सदस्यगम   (@Vatican Media)

उन्होंने कहा कि कलीसिया के शासन में हम इन अद्वितीय विशेषताओं को पाते हैं, जो कभी भी अपने में सिर्फ तकनीकी मात्र नहीं है, बल्कि यह एक मुक्ति अर्थात विश्वासियों को आध्यात्मिक चीजों की अग्रसर करती है। हम इसे संत पौलुस के शब्दों में पाते हैं, “हमारे लिए चमत्कार है, वे लिखते हैं, चंगाई, सहायता, संचालन और विभिन्न भाषाएँ बोलने के उपहार है।” (1 कुरू. 12.28)

हमारा उत्तरदायित्व

इन बातों का उल्लेख करते हुए संत पापा ने विश्वासियों और कलीसियाई संघ के सदस्यों से कहा कि यह लोकधर्मियों का शासन है जो बपतिस्मा में हमें ख्रीस्त के राजकीय पदों से विभूषित करता है। “यह हमारे लिए वह स्थल बनता है जहाँ हम दूसरे विश्वासियों, संघ के जीवन की सेवा हेतु बुलाये जाते हैं, जो हमें दूसरों की स्वतंत्र अभिव्यक्तियों को सुनते हुए साझा आत्मपरख हेतु निमंत्रण देता है।”

संत पापा लियो का संबोधन
संत पापा लियो का संबोधन   (@Vatican Media)

तीन बिन्दु

संत पापा लियो ने पवित्र आत्मा की प्रेरणा में शासन के तीन मुख्य बिन्दुओं की ओर ध्यान आकर्षित करते हुए कहा कि यह सभों की भलाई हेतु हो अर्थात इसके द्वारा समुदाय, संघ और पूरी कलीसिया का हित होता हो। अतः शासन का दुरूपयोग व्यक्तिगत हित या दुनियावी रूप में प्रसिद्धि और शक्ति के उपयोग हेतु न हो। दूसरा इसका उपयोग ऊपर से दबाव के लिए कभी न हो, लेकिन उपहार स्वरूप समुदाय द्वारा स्वतंत्र रूप से स्वीकार किया जाता हो- अतः स्वतंत्रता में चुनाव जो उसे प्रभावकारी बनाता हो। तीसरा संघ के शासन में आत्मापरख शामिल हो जो आदर्शों को सत्यापित करते हुए उनका उचित उपयोग करता हो।

संत पापा ने शासन के संबंध में कुछ विन्दुओं की ओर ध्यान आकर्षित करते हुए कहा कि उसमें एक-दूसरे को सुनना, सह-उत्तरदायित्व, पारदर्शिता, भातृत्वमय निकटता और सामुदायिक आत्मपरख की विशेषताएं सदैव होनी चाहिए। “अच्छा शासन को चाहिए कि वह अपने में केन्द्रित न हो बल्कि सहायक और पूरे समुदाय की एक जिम्मेदारी पूर्ण सहभागिता हो।” ये सारी चीजें हमारे लिए दिशा-निर्देशिका की भांति हैं लेकिन इनमें सदैव अधिकारी के कर्तव्य को ध्यान में रखा जाना चाहिए।

संत पापा का अभिवादन
संत पापा का अभिवादन   (@VATICAN MEDIA)

संघों का संचालन नाजुक कार्य

संत पापा ने संघों और आंदोलनों की अलग-अलग जगहों से हुई शुरूआत और उनके इतिहास, पहचान और आदर्श की ओर ध्यान आकर्षित कराते हुए कहा कि उनका संचालन एक नाजुक काम है। यह उन्हें अपनी विरासत को बनाए रखने और उसका विकास हेतु बुलायी जाती है, वहीं दूसरी उनकी भूमिका “नबूबत” होती है, जिसमें प्रेरितिक ज़रूरतों को सुनना शामिल है ताकि नई चुनौतियों और सांस्कृतिक, सामाजिक और आध्यात्मिक भावनाओं का प्रत्तुयत्तर दिया जा सके। “हम ऐसा करने के द्वारा ही समाज और कलीसिया में एक ख्रीस्तीय, एक शिष्य और एक प्रेरित बन सकते हैं।”

कार्य की चुनौतियाँ

संत पापा लियो ने एक और बहुत ज़रूरी चीज़- मेलजोल की ओर ध्यान आकर्षित कराते हुए कहा कि जो लोग शासन करते हैं, उन्हें मेलजोल को बनाए रखने, उसका विकास और उसे मज़बूत करने हेतु खास तौर पर संवेदनशील होने की आवश्यकता है। यह संघ के अंदर की ज़िंदगी और दूसरी कलीसिया के लोगों और पूरी कलीसिया के लिए लागू होता है। जो लोग कलीसियाई प्रेरिताई की शासन व्यवस्था में भाग लेते हैं उन्हें चाहिए कि वे अलग-अलग विचारों, अलग-अलग संस्कृति और आध्यात्मिक विचारों, लोगों के व्यवहार को सुनना और उनके अनुरूप कार्य करना सीखें। उन्हें चाहिए कि वे कठिन निर्णय की परिस्थितियों में एकता में बने रहें। यह उनसे विन्रमता का साक्ष्य देने, तटस्थता और स्वार्थ से ऊपर उठने की मांग करता है जिससे वे समुदाय के हित में अपने कार्यों को पूरा कर सकें।

संत पापा लियो और संघ के सदस्य
संत पापा लियो और संघ के सदस्य   (@VATICAN MEDIA)

इस संदर्भ में, संत पापा ने संघ के आर्दश निष्ठा के बारे में जोर दिया जो कलीसियाई संस्थान के लिए ज़रूरी है। उन्होंने कहा कि यह हमसे खुलेपन की मांग करती है जो हमें वार्ता करते हुए नयी चुनौतियों और सच्चाईयों का सामना करने को मदद करती है।

संत पापा संघ के सभी सदस्यों के प्रति कृतज्ञता के भाव प्रकट करते हुए उन्हें अपने गुणों को एक दूसरे के संग साझा करने और सुसमाचार प्रचार करने का आहवान किया। 

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21 मई 2026, 16:27