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ख्रीस्तीयों  के उत्पीड़न में वृद्धि (प्रतीकात्मक तस्वीर)  ख्रीस्तीयों के उत्पीड़न में वृद्धि (प्रतीकात्मक तस्वीर)  

विश्व में प्रताड़ित ईसाइयों की संख्या बढ़ी

मानवाधिकार संगठन ओपन डोर्स ने बुधवार को अपनी वर्ल्ड वॉच लिस्ट 2026 जारी कर ख्रीस्तीय धर्मानुयायियों के विरुद्ध बढ़ती हिंसा की ओर ध्यान आकर्षित कराया है।

वाटिकन सिटी

केलिफोर्निया, शुक्रवार, 16 जनवरी 2026 (वाटिकन न्यूज़): केलिफोर्निया स्थित मानवाधिकार संगठन ओपन डोर्स ने बुधवार को अपनी वर्ल्ड वॉच लिस्ट 2026 जारी कर ख्रीस्तीय धर्मानुयायियों के विरुद्ध बढ़ती हिंसा की ओर ध्यान आकर्षित कराया है।

महिलाएं एवं बच्चे प्रताड़ित

ओपन डोर्स संगठन के निर्देशक क्रिस्टियन नैनी ने वाटिकन न्यूज़ से बातचीत में बताया कि अधिकांश प्रताड़ितों में महिलाएं और बच्चे शामिल हैं तथा इस मामले में अफ्रीका का उपसहारा क्षेत्र विशेष चिन्ता का विषय बना हुआ है।

तमाम विश्व में उत्पीड़न का सामना करने वाले और हिंसा का शिकार होने के जोखिम में रहने वाले ईसाइयों की संख्या पिछले साल की तुलना में 80 लाख बढ़ी है और इस तरह 38 करोड़ अस्सी लाख तक पहुँच गई है। इनमें 20 करोड़ 10 दस लाख महिलाएँ एवं किशोरियाँ हैं, जबकि एक करोड़ 10 लाख 15 वर्ष की आयु से कम उम्र वाले बच्चे हैं।  

हिंसा और भेदभाव

वर्ल्ड वॉच लिस्ट के अनुसार, ईसाई धर्म के खिलाफ़ ज़ुल्म के "अति अधिक" स्तर वाले देशों की संख्या 13 से बढ़कर 15 हो गई है।

उत्तरी कोरिया अब भी वह देश है जहाँ ईसाई होना सबसे ख़तरनाक है। खतरनाक स्तर पर ज़ुल्म झेलने वाले देशों की सूची में सोमालिया, इरिट्रिया, लीबिया, अफ़गानिस्तान, यमन, सूडान, माली, नाइजीरिया, पाकिस्तान, ईरान, भारत, सऊदी अरब, म्यांमार और सीरिया भी शामिल हैं। वॉच लिस्ट के मुताबिक, सीरिया “हाई” से “एक्सट्रीम” स्तर पर पहुँच गया है।

अफ्रीका में

अफ्रीका में नाइजीरिया को हिंसा का केंद्र माना गया है, जहाँ इस वर्ष 3,490 लोग मारे गए, जो दुनिया भर में मारे गए लोगों का लगभग 70 प्रतिशत है। इसके अतिरिक्त, लगभग चार हज़ार ख्रीस्तीयों को अकारण गिरफ्तार किया गया तथा लगभग तीन हज़ार ख्रीस्तीय अपहरण का शिकार बने।

निर्देशक नैनी ने कहा कि गृहयुद्ध की वजह से सूडान खास तौर पर हिंसा से घिरे देशों में से एक है, लेकिन नाइजीरिया, माली, नाइजर, बुर्किना फासो, डेमोक्रेटिक रिपब्लिक ऑफ़ कांगो और मोज़ाम्बिक में भी हिंसा जारी है, और इसका कारण आर्थिक पहलू के साथ-साथ धार्मिक भेदभाव है।  

 

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16 जनवरी 2026, 10:18