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संत पापा और कार्डिनल लदारिया संत पापा और कार्डिनल लदारिया  (ANSA)

अंतरराष्ट्रीय ईशशास्त्रीय आयोग को संत पापा का संदेश

संत पापा फ्रांसिस ने अंतरराष्ट्रीय ईशशास्त्रीय आयोग को अपने संबोधन में सृजनात्मक निष्ठा, खुलेपन और कलीसिया की सिनोडलिटी की ओर ध्यान आकृष्ट कराया।

दिलीप संजय एक्का-वाटिकन सिटी

वाटिकन सिटी, गुरूवार, 24 नवम्बर 2022 (रेई) संत पापा फ्रांसिस ने अंतरराष्ट्रीय ईशशास्त्रीय आयोग के सदस्यों मुलाकत करते हुए उन्हें उनकी प्रेरिताई कार्य हेतु कृतज्ञता के भाव प्रकट करते हुए दिशा निर्देशन दिये।

संत पापा फ्रांसिस ने अपने संबोधन के शुरू में अंतरराष्ट्रीय ईशशास्त्रीय आयोग की तीन खास मुद्दों के बारे में जिक्र किया- पहला ख्रीस्तीय विश्वास को फलहित करना जो नाईसिन धर्मसार की 1700वीं सालगिराह को सशक्त बनाती है, दूसरा दिव्य मुक्ति योजना से संदर्भ में उभर रहे कुछ मानवशास्त्रीय सवालों की जाँच करना जो मानव परिवार की यात्रा के लिए महत्वपूर्ण है और तीसरा त्रित्ववादी दृष्टिकोण से सृष्टि के धर्मशास्त्र को गहरा करना जो गरीबों और पृथ्वी की पुकार को सुने का आहृवान करती है।

संत पापा के कहा आप इन मुद्दों पर चर्चा करते हुए कलीसिया के लिए अपनी सेवा को और भी प्रगाढ़ और नवीन बनाते हैं। उन्होंने कहा कि इस ऐतिहासिक क्षण में, जो अपने में कठिन है यद्यपि हम विश्वास और आशा में इस प्रतिज्ञा को पूरा करने हेतु आगे बढ़ते हैं जिसे हमने क्रूसित पुनर्जीवित प्रभु के पास्का में पाया है। अंतरराष्ट्रीय ईशशास्त्रीय आयोग की प्रेरिताई के संबंध में संत पापा ने तीन बातों की ओर ध्यान आकर्षित कराया। 

सृजनात्मक निष्ठा

संत पापा ने परंपरा के प्रति सृजनात्मक निष्ठा के बारे में कहा कि ईशशास्त्र की प्रेरिताई हमें विश्वास, प्रेम और कठोरता की जगह खुलेपन में अपने कार्यों के निर्वाहन हेतु निमंत्रण देती है, जहाँ हम ईश वचनों को सुनने, धर्मसिद्धांत और उसके आदर्शों का आत्म-परीक्षण करते हुए अपनी प्रेरितिक कार्यों को पवित्र आत्मा की सहायता में निष्ठापूर्वक करने हेतु बुलाये गये हैं। संत पापा बेनेदिक्त 16वें ने परंपरा को परिभाषित करते हुए कहा हैं “यह एक नदी का भांति है जिसमें असल चीजें सदैव व्याप्त रहती हैं” जिससे “विभिन्न स्थानों, भू-भागों को पोषित किया जा सके और हम सबसे अच्छी धरती, उत्तम संस्कृति का उत्पादन कर सकें। इस भांति हम सुसमाचार को विश्व के कोने-कोने में नये तरीके से प्रसारित करते हैं।”

संत पापा ने कहा कि परंपरा या तो बढ़ती या मर जाती है। यह भविष्य को सुनिश्चितता प्रदान करती है न कि संग्रहलाय में रखी जाने वाली कोई एक चीज है। उन्होंने कहा कि परंपरा “कलीसिया रुपी पेड़ स्वरुप नीचे से ऊपर की ओर बढ़ती है।” वहीं किसी ने परंपरावाद को “जीवितों का मृत विश्वास कहा है” यह तब होता है जब हम अपने को बंद कर लेते हैं। संत पापा ने कहा कि परंपरा हमें आगे ले चलती है लेकिन हम आज एक बड़े खतरे की स्थिति में हैं क्योंकि हम अपने को दूसरी दिशा में बढ़ता हुआ पाते हैं। आगे बढ़ने के बदले पीछे की ओर लौट रहे हैं, जहाँ हम बहुत यह कहते हैं “हम सदैव ऐसा ही करते आ रहे हैं”। ईशशास्त्रियों के रुप में आप को इसके बारे में थोड़ा विचार करना होगा।

खुलापन

अवसरों के संदर्भ में, संत पापा ने अपने दिशा-निर्देशन के दूसरे बिन्दु के बारे में कहा कि सुसमाचार को गहराई तक लेने और उसे वर्तमान परिस्थिति में सारगर्भित बनाने हेतु हमें अपने को दूसरे धर्मों के लिए खोलने की जरुरत है। उन्होंने विशेषज्ञों के प्रति अपने अभार व्यक्त किये जो अपने ज्ञान को साझा करने के माध्यम विभिन्न बहु-विषयकों को एक-दूसरे के निकट लाते हैं और उनकी अच्छी समझ प्रस्तुत करते हैं।

सहभागिता और सहचर्य

तीसरे बिन्दु सहचर्य में सहभागिता का जिक्र करते हुए संत पापा ने कहा कि यह हमें एक सिनोडल कलीसिया के रुप में आगे बढ़ने को मदद करेगा जहाँ ईश प्रजा एक साथ एकत्रित होती है। “ईशशास्त्री का बुलावा समुदाय के निर्माण हेतु हुआ है।” हरएक ईशशास्त्री इस भांति अपनी में सुनने, वार्ता करने, आत्म-परख करते हुए विभिन्न बातों में सामंजस्य स्थापित करने हेतु बुलाया गया है।

अपने संबोधन के अंत में संत पापा फ्रांसिस ने ईशशास्त्रीय आयोग को सुनने, वार्ता करने, सामुदायिक आत्म-परीक्षण करते हुए पवित्र आत्मा की प्रेराणा को खुले हृदय से सुनने का आहृवान किया। “ईश्वर हमें एक कलीसिया के रुप में, येसु ख्रीस्त में वैश्विक भ्रातृत्वमय जीवन यापना करने को बुलाते हैं।”  

24 November 2022, 16:09