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संत पापा लियो बुधवारीय आमदर्शन समारोह में संत पापा लियो बुधवारीय आमदर्शन समारोह में  (ANSA)

संत पापा लियोः ईशवचन और कलीसियाई परंपरा हमारी अमानत

संत पापा लियो 14वें ने अपने बुधवारीय आमदर्शन समारोह की धर्मशिक्षा माला में द्वितीय वाटिकन महासभा के धर्मसिद्धांत देई बेरबुम पर चिंतन करते हुए ईशवचन और कलीसिया की परंपरा पर विचारमंथन किया।

वाटिकन सिटी

संत पापा लियो अपने बुधवारीय आमदर्शन समारोह के अवसर पर संत पापा पौल षष्ठम के सभागार में एकत्रित सभी विश्वास और तीर्थयात्रियों का अभिवादन करते हुए कहा, प्रिय भाइयो एवं बहनों, सुप्रभात और सुस्वागतम।

द्वितीय वाटिकन महासभा के धर्मसिद्धांत देई बेरबुम में दिव्य प्रकाशाना पर अपना चिंतन जारी रखते हुए आज हम पवित्र धर्मग्रंथ और परंपरा के बीच संबंध पर विचारमंथन करेंगे। इसके लिए हम सुसमाचार के दो दृश्यों को पृष्टपट के रुप में ले सकते हैं। प्रथम को हम अंतिम व्यारी की कोठरी में देखते हैं जहाँ येसु अपने शिष्यों को एक महत्वपूर्ण बात की शिक्षा दी, “तुम्हारे साथ रहते समय मैंने तुम लोगों को इतना ही बताया है। परन्तु वह सहायक, वह पवित्र आत्मा, जिसे पिता मेरे नाम पर भेजेगा, तुम्हें सब कुछ समझा देगा। मैंने तुम्हें जो कुछ बताया, वह उसका स्मरण दिलायेगा” (यो.14.25-26)।

ईशवचन का विस्तार

दूसरे को हम गलीलिया की पहाड़ी में घटित पाते हैं। पुनर्जीवित येसु अपने को शिष्यों के लिए प्रकट करते हैं, जो आश्चर्यचकित होते और संदेह करते हैं, और वे उन्हें निर्देश देते हैं, “इसलिए तुम लोग जाकर सब राष्ट्रों को शिष्य बनाओ और उन्हें पिता, पुत्र आर पवित्र आत्मा के नाम पर बपतिस्मा दो। मैंने तुम्हें जो-जो आदेश दिये हैं, तुम लोग उनका पालन करना उन्हें सिखलाओ” (मत्ती 28.19-20)। इन दोनों दृश्यों में, हम येसु के द्वारा कहे गये शब्दों और सदियों से सारी दुनिया में उनके विस्तार के बीच गहरे संबंध को पाते हैं।

पवित्र परंपरा और पवित्र धर्मग्रंथ

संत पापा ने कहा कि इसी तथ्य को वाटिकन द्वितीय महासभा एक विचारोत्तेजक निशानी का उपयोग करते हुए सुदृढ़ता प्रदान करती है, “हम पवित्र परंपरा और पवित्र धर्मग्रंथ के बीच में एक निकटतम संबंध और संचार को पाते हैं। क्योंकि दोनों की उत्पत्ति एक ही दिव्य स्रोत से होती है, वे सुनिश्चित रुप में एक साथ मिलते और एक ही लक्ष्य की ओर बढ़ते हैं। (देई बेरबुम 9)। कलीसियाई परंपरा को हम कलीसिया के पूरे इतिहास में फैलता हुआ पाते हैं, जो उसे सुरक्षित रखती, उसे परिभाषित करती और अपने में ईश्वर के वचनों को वहन करती है। काथलिक कलीसिया की धर्मशिक्षा हमें इस संबंध में, कलीसिया के आचार्यों के कथन की ओर ध्यान आकर्षित कराती है, “पवित्र धर्मग्रंथ मुख्यतः कलीसिया के हृदय में लिखा गया है, न की दस्तावेजों और अभिलेख में”, अर्थात यह पवित्र ग्रंथ है।

उपयुक्त कथन के अनुरूप, ख्रीस्त के शब्दों के प्रकाश में, धर्मसभा यह सुनिश्चित करती है कि “परंपरा जो प्रेरितों से आती है, पवित्र आत्मा की सहायता से कलीसिया में विकसित होती है” (देई बेरबुम, 8)। यह “विश्वासियों द्वारा किए गए चिंतन और अध्ययन” के माध्यम से पूरी समझ में होता है, “उन आध्यात्मिक सच्चाइयों की गहरी समझ के ज़रिए जिनका वे अनुभव करते हैं”, और उससे भी बढ़कर, प्रेरितों के उत्तराधिकारियों के उपदेशों द्वारा जिन्होंने “सत्य का निश्चित उपहार” प्राप्त किया है।

बुधवारीय आमदर्शन समारोह की धर्मशिक्षा

धर्मग्रंथ का विकास

इस संदर्भ में, संत ग्रेगोरी महान के कथन अपने में प्रसिद्ध हैः “पवित्र धर्मग्रंथ का विकास उसके अध्ययन करने वाले के संग होता है।” और संत अगुस्टीन ने इसके बारे में पहले ही घोषित किया था, “ईश्वर का वचन केवल एक ही है जो धर्मग्रंथ के माध्यम प्रकट होता है, और केवल एक ही शब्द जो बहुत से संतों के होठों में ध्वनित होती है।” ईश्वर का वचन, इस भांति अपने में जीवाश्म नहीं है, बल्कि यह सजीव और जैविक वास्ताविकता है जो परंपरा में विकसित और प्रसारित होती है। हम इसके लिए पवित्र आत्मा का धन्यवाद करते हैं, परंपरा इसे इसकी सच्चाई की समृद्धि में समझती है और इसके इतिहास को बदलते परिवेश का अंग बनाती है।

संत पापा लियो ने कहा कि इस संदर्भ में, कलीसिया के आचार्य जोन हेनरी न्यूमैन अपने कार्यों की संचरना में इसे ख्रीस्तीय धर्मसिद्धांत का विकास की संज्ञा देते हैं जो आकर्षक है। वे इस बात पर जोर देते हैं कि ख्रीस्तीयता, सामुदायिक अनुभव और एक धर्मसिद्धांत दोनों के रुप में, अपने में एक वास्ताविक आयाम है, जैसे कि येसु ख्रीस्त ने स्वयं बीज के दृष्टांत में इसकी ओर इंगित किया (मर,4.26-29), एक जीवित सच्चाई जो अपने में विकसित होती है जिसके लिए हम एक आंतरिक शक्ति के प्रति शुक्रगुजार हैं।

निधि सुरक्षित रखें

संत पापा ने कहा कि संत पौलुस निरंतर अपने शिष्य और सहयोगी तिमथी को इस बात कें संबंध में कहते हैं, “तिमथी, तुम्हे जो निधि सौंपी गई है उसे सुरक्षित रखो” (1 तिमथी 6.20, 2 तिमथी 1: 12-14)। देई बेरबुम का धर्मसिद्धांत संत पौलुस के इस पद में ध्वनित होती है जहाँ वे कहते हैं, “पवित्र परंपरा और पवित्र धर्मग्रंथ ईश्वर के वचनों की एक अमानत है, यह कलीसिया को दिया गया है, जो “कलीसिया की संजीव शिक्षण” से परिभाषित है, जिसके अधिकार का उपयोग येसु ख्रीस्त के नाम से किया जाता है।” “अमानत” एक शब्द है, जो अपने वास्ताविक अर्थ में, कानूनी प्रकृति को वहन करती है और “अमानतदार” पर चीजों को सुरक्षित रखने की ज़िम्मेदारी होती है, इस संबंध में हम विश्वास को पाते हैं, और इसे सही रुप में दूसरों को देना है।

ईश वचन की “अमानत” कलीसिया और हम सबके हाथों में है, जिसे हमें विभिन्न प्रेरितिक कार्यों के माध्यम से, इतिहास और अस्तित्व की जटिलता के बीच हमारी यात्रा के लिए, हमें एक मार्गदर्शक स्वरूप इसकी निष्ठा को बनाये रखने की जरूरत है।

धर्मग्रंथ और परंपराः कलीसियाई ताना-बाना

संत पापा ने अपनी धर्मशिक्षा के अंत में कहा, प्रिय मित्रों, हम देई बेरबुम को पुनः सुनें, जो पवित्र धर्मग्रंथ और परंपरा को ताने-बाने को प्रस्तुत करती हैः यह इस बात की पुष्टि करता है कि वे “इस प्रकार एक-दूसरे से जुड़े हुए हैं कि एक के बिना दूसरे का अस्तित्व नहीं रह सकता है, और... सभी अपने में और अपने-अपने तरीके से, पवित्र आत्मा के प्रभाव से आत्माओं की मुक्ति हेतु प्रभावकारी ढ़ग से कार्य करते हैं।”

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28 जनवरी 2026, 15:13