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संत पापा लियो बुधवारीय आमदर्शन समारोह में संत पापा लियो बुधवारीय आमदर्शन समारोह में  (ANSA)

संत पापा लियोः ईश्वर की भाषा मानवीय समझ के अनुरूप

संत पापा लियो ने अपने बुधवारीय आमदर्शन समारोह की धर्मशिक्षा माला में, देई बेरबुम पर चिंतन करते हुए, धर्मग्रंथ में ईश्वरीय भाषा और उसके लेखकों पर विचार मंथन किये।

वाटिकन सिटी

संत पापा लियो ने अपने बुधवारीय आमदर्शन समारोह के अवसर संत पापा पौल षष्ठम के सभागार में एकत्रित सभी विश्वासियों और तीर्थयात्रियों का अभिवादन करते हुए कहा, प्रिय भाइयो एवं बहनों, सुप्रभात और सुस्वागतम्।

वाटिकन द्वितीय महासभा की देई बेरूबुम जिस पर हम इन सप्ताहों में विचार-मंथन कर रहे हैं, हमें पवित्र धर्मग्रंथ की ओर इंगित कराता है, जिसे हम कलीसिया की सजीव परंपरा में अध्ययन करते हैं, जो हमारे लिए निरंतर ईश्वर से मिलन हेतु एक महत्वपूर्ण स्थल बनता है जहाँ ईश्वर हर समय के नर-नारियों से बातें करते हैं, जिससे वे उन्हें सुनें, जानें और प्रेम कर सकें। धर्मग्रंथ के पद, यद्यपि, स्वर्गीय या सुपरमानव की भाषा में नहीं लिखा गया है। वास्तव में, जैसे कि दैनिक जीवन हमें शिक्षा देती है, दो अलग-अलग भाषा बोलने वाले व्यक्ति एक दूसरे को नहीं समझ सकते हैं, वे वार्ता में प्रवेश नहीं कर सकते और इस तरह वे एक संबंध स्थापित करने में अयोग्य होते हैं। कुछ परिस्थितियों में, अपने को दूसरों को लिए समर्पित करना प्रेम का प्रथम कार्य होता है। यही कारण है ईश्वर मानवीय भाषा का उपयोग करते हुए हमसे बातें करने का चुनाव करते हैं, और इस भांति हम विभिन्न लेखकों को देखते हैं जो पवित्र आत्मा से प्रेरित किये गये, जिन्होंने पवित्र धर्मग्रंथ के पदों को लिखा। जैसे कि हमें धर्मसभा का दस्तावेज याद दिलाता है, “ईश्वर का वचन, जो मानवीय भाषा में व्यक्त किया गया है, अपने में मानवीय वार्ता की भांति है, वैसे ही दिव्य पिता ईश्वर के शब्द, जो मानवीय कमजोर शरीर को धारण करते हुए, हर बात में मानव की तरह बन गये। अतः न केवल इसका सार बल्कि इसकी भाषा, धर्मग्रंथ मनुष्यों के प्रति ईश्वर की दयालुता और उनके निकट रहने की इच्छा को प्रकट करता है।

संत पापा लियो आमदर्शन समारोह में
संत पापा लियो आमदर्शन समारोह में

संत पापा ने कहा कि कलीसिया के सम्पूर्ण इतिहास में, पवित्र ग्रंथ के दिव्य लेखकों और मानवीय लेखकों के बीच संबंध के बारे में अध्ययन किया गया है। बहुत सदियों तक, बहुत से ईशशास्त्रियों ने पवित्र धर्मग्रंथ की दिव्य प्रेरणा का बचाव करने की चिंता की, इस भांति मानव लेखकों को सिर्फ़ पवित्र आत्मा के सकारात्मक साधनों स्वरुप माना जाता था। हाल के दिनों में, पवित्र ग्रंथ के लेखन में संत-महापुरुषों के योगदान का पुनः मूल्यांकन किया गया है, उस सीमा तक जहाँ महासभा के दस्तावेज ईश्वर को पवित्र धर्मग्रंथ के प्रधान रचियता स्वरुप घोषित करता है, इसके साथ ही संत-महापुरूषों को पवित्र पुस्तिकाओं के “सच्चे लेखकों” की संज्ञा दी जाती है। जैसा कि पिछली सदी के एक प्रखर व्याख्याकार ने कहा था, “मानव कार्य को सिर्फ़ एक लिपिक तक सीमित कर देना, दिव्य कार्य को महिमामंडित करना नहीं है।”ईश्वर कभी भी मानवीय क्षमताओं को नगण्य रुप में नहीं देखते हैं।

युवाओं के संग संत पापा लियो
युवाओं के संग संत पापा लियो   (ANSA)

अतः, इसलिए धर्मग्रंथ मानवीय शब्दों में ईश्वर का वचन है, कोई भी दृष्टिकोण जो इन दो आयामों में से किसी एक की उपेक्षा या इंनकार करता है, वह पक्षपातपूर्ण साबित होता है। यह इस तथ्य का अनुसरण करती है कि पवित्र ग्रंथों की सही व्याख्या उस ऐतिहासिक माहौल का परित्याग कर सकती है जिसमें उनका विकास हुआ और जिस साहित्यिक रूप का इस्तेमाल किया गया; इसके विपरीत ईश्वर के द्वारा उपयोग किये गये मानवीय शब्दों की पढ़ाई को छोड़ना हमें धर्मग्रंथ का कट्टरपंथी या अध्यात्मवादी अध्ययन की जोखिम में डाल देता है, जो उसके पूरे अर्थ को खारिज करता है। हम इसी सिद्धांत को ईश वचन की घोषणा में भी लागू होता पाते हैं, यदि इसका संबंध वास्ताविकता, मानवीय आशाओं और दुःख-दर्दों से नहीं होता, यदि इसमें न समझे जाने वाली संवादहीन या पुरानी भाषा का उपयोग किया जाता है, तो यह प्रभावहीन हो जाता है। हर युग में, कलीसिया से ईशवचन को ऐसी भाषा में फिर से पेश करने की मांग की जाती है जो इतिहास को अपने में वहन करती और हृदयों तक पहुँची हो। जैसे कि संत पापा फ्रांसिस हमें याद दिलाते हैं, “जब कभी हम स्रोत की ओर लौटने का प्रयास करते हैं और सुसमाचार के वास्ताविक ताजगी को पुनः खोजते हैं, तो हमारे लिए नयी चीजें उभर कर आती हैं, सृजनत्मकता में नये मार्ग खुलते हैं, जिन्हें हम विभिन्न अभिव्यक्ति में पाते हैं, हम उनमें वर्तमान दुनिया से संबंधित अद्वितीय निशानियों और शब्दों के नये अर्थ को पाते हैं।

संत पापा लियो का अभिवादन
संत पापा लियो का अभिवादन   (ANSA)

वहीं दूसरी ओर, दिव्य उत्पत्ति को नजरअंदाज करना, धर्मग्रंथ के अध्ययन को लघुकृत कर देता और उसकी समझ को केवल मानवीय शिक्षण, एक तकनीकी दृष्टिकोण से अध्ययन या उसे अतीत की एक विषयवस्तु तक ही सीमित कर देता है। इसके बदले, धर्मविधि के संदर्भ में उसे घोषित करने में यह विश्वासियों को संदेश देता, उनके वर्तमान जीवन और उनकी समस्याओं का स्पर्श करता और उनके मार्गों को प्रज्वलित करते हुए उन्हें निर्णयों को लेने में मदद करता है। यह केवल तब संभव होता है जब विश्वासी पवित्र धर्मग्रंथ के पदों का अध्ययन और उसका अर्थ पवित्र आत्मा की प्रेरणा में करते हैं, जो उन्हें प्रेरित करता है।

संत पापा लियोः देई बेरबुम पर धर्मशिक्षा

इस संदर्भ में, धर्मग्रंथ हमारे लिए जीवनदायी और विश्वासियों के लिए प्रेम को पोषित करता है, जैसे की संत अगुस्टीन हमें याद दिलाते हैं, “जो कोई...यह समझता है कि वह पवित्र धर्मग्रंथ को समझता है... लेकिन ख्रीस्त के बारे में इस तरह की व्याख्या उसे ईश्वर और अपने पड़ोसी के प्रति दोहरे प्रेम के निर्माण में मदद नहीं करता, तो वह उसे उस रुप में नहीं समझता जैसा उसे समझना चाहिए।”धर्मग्रंथ की दिव्य उत्पत्ति हमें इस बात की भी याद दिलाती है कि सुसमाचार, बपतिस्मा प्राप्त लोगों के लिए साक्ष्य स्वरूप दिया गया है, जो जीवन के सभी आयामों और सच्चाई का आलिंगन करने के बावजूद, उन्हें परे ले जाता है, हम इसे सिर्फ़ एक भलाई या सामाजिक संदेश के रुप में सीमित नहीं कर सकते हैं, बल्कि यह आनंद में उस सम्पूर्ण अनंत जीवन की घोषणा करता है जिसे ईश्वर ने हमें येसु ख्रीस्त में प्रदान किया है।

संत पापा दंपत्तियों से वार्ता करते हुए
संत पापा दंपत्तियों से वार्ता करते हुए   (ANSA)

प्रिय भाइयो एवं बहनों, संत पापा ने कहा हम ईश्वर का धन्यवाद करें, जिन्होंने अपनी अच्छाई में हमें इस बात की निश्चितता प्रदान की है कि हमारे लिए उनके जीवनदायी वचनों की कमी न हो, और हम प्रार्थना करें कि हमारे शब्द और उससे भी बढ़कर हमारा जीवन, ईश्वर के प्रेम को धूमिल न करे जिसकी चर्चा उनमें की गई है।

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04 फ़रवरी 2026, 15:09