संत पापा लियोः चालीसा की यात्रा हममें परिवर्तन लाये
वाटिकन सिटी
संत पापा लियो 14वें ने चालीस काल के अपने संदेश में विश्वासियों को सुनने, उपवास करने और एकता में बने रहने का आहृवान किया है।
प्रिय भाइयो एवं बहनों,
संत पापा लियो चालीसा कलीसिया के संदेश की शुरूआत करते हुए कहते हैं यह वह अवधि है जो हमें ईश्वर के रहस्य को जीवन के केन्द्र में रखने को निमंत्रण देता है, यह हमारे विश्वास को नवीकृत करता है जिसके द्वारा हम अपने दैनिक जीवन में होने वाली चिंताओं और घबराहटों का सामना करने को सक्षम होते हैं।
हर परिवर्तन का मार्ग, ईश्वर के वचनों द्वारा अपने हृदय को स्पर्श करने देना है,जिसका स्वागत हम एक नम्र मनोभाव से करते हैं। हम शब्दों की स्वीकृति और उसके द्वारा होने वाले परिवर्तन के बीच एक संबंध को पाते हैं। यही कारण है, चालीसा की यात्रा हमारे लिए ईश्वर की आवाज को सुनने का अवसर प्रदान करती है जहाँ हम उनका अनुसरण करने हेतु अपनी निष्ठा को नवीकृत करते हुए उनके संग येरुसालेम के मार्ग में चलते हैं जहाँ दुःखभोग, मृत्यु और पुनरूत्थान के रहस्य अपनी पूर्णतः को प्राप्त करते हैं।
सुनना
सुनने के मनोभाव के संबंध में उन्होंने कहा कि सुनने की चाह वह प्रथम कड़ी है जो हमारे लिए इस बात को व्यक्त करती है कि हम किसी के संग एक संबंध में प्रवेश करने की चाह रखते हैं।
जलती झाड़ी में अपने को प्रकट करते हुए ईश्वर हमें इस बात की शिक्षा देते हैं कि सुनना उनकी एक विशेषता है, “मैंने उनकी दयनीय दशा देखी है, मैंने उनकी पुकार सुनी है” (निग्र.3.7) प्रताड़ित लोगों की पुकार को सुनना मुक्ति इतिहास की शुरूआत है जहाँ ईश्वर मूसा को अपनी चुनी हुई प्रजा हेतु कार्य करने, गुलामी में पड़े लोगों हेतु मुक्ति का मार्ग प्रशस्त करने भेजते हैं।
संत पापा अपने संदेश में कहते हैं, “ईश्वर हमसे सहभागिता की चाह रखते हैं।” वे आज भी अपने हृदय में व्याप्त बातों को हमारे संग साझा करते हैं। यही कारण है, धर्मविधि में वचनों को सुनना हमें सच्चाई को सुनने की शिक्षा देती है। हम व्यक्तिगत और सामाजिक जीवन में उपस्थित बहुत-सी आवाजों के बीच, सुसमाचार के माध्यम उन लोगों की रूदन को सुनने और उनका प्रत्युत्तर देते हैं जो दुःख और तकलीफ में पड़े हैं। सुनने हेतु इस आंतरिक खुलेपन को पोषित करना हमें ईश्वर से सीखने को कहता है। हम अपने इतिहास में, अपने समाज, राजनीति में, आर्थिक रुप में गरीबों की स्थिति को, उनकी रूदन को समझें।
उपवास
संत पापा ने उपवास के संबंध में कहा कि यदि चालीसा सुनने का एक समय है, तो उपवास हमें ईश्वर के वचन को स्वीकरने हेतु ठोस रूप में तैयार करता है। भोजन के परित्याग को, हम इतिहास से चली आ रहे एक अभ्यास स्वरूप पाते हैं जो मनपरिवर्तन हेतु जरुरी है। यह विशेष कर हमारे शरीऱ के बारे में है क्योंकि इसके द्वारा हम सहज ही अपनी जीविका की चीजें को पहचानते हैं। उसके भी बढ़कर यह हमें अपनी पहचान और “भूखों” की सूची तैयार करने में मदद करता है, यह न्याय के लिए हमारी भूख और प्यास को ज़िंदा रखती और हमें आत्मसंतुष्टि से मुक्त करती है। इस भांति यह हमें प्रार्थना करने और अपने पड़ोसियों के लिए उत्तरदायी होने में मदद करता है।
संत पापा ने कहा कि आध्यात्मिक विचारों में, संत अगुस्टीन हमें हृदय में होने वाले वर्तमान के तनाव और भविष्य में होने वाली परिपूर्णत को समझने में मदद करते हैं। “भौतिक दुनिया में, न्याय हेतु भूखा और प्यासा रहना नर और नारियों की जरुरत है, लेकिन संतुष्ट होना आनेवाले जन्म का हिस्सा है। फ़रिश्ते इस रोटी, इस भोजन से संतुष्ट हो जाते हैं। दूसरी तरफ़, मानव इसके लिए भूखा रहता है; हम सब अपनी चाहत में इसकी ओर आकर्षित होते हैं। यह आकर्षण हमारी आत्मा को विस्तृत करता है और उसकी योग्यता को बढ़ाता है।” इस संदर्भ में हम इस तथ्य को समझते हैं कि उपवास केवल हमारी इच्छाओं को नियंत्रित, परिशुद्ध और मुक्ति प्रदान नहीं करता बल्कि यह उसे विकसित भी करता है जहाँ हम ईश्वर की ओर आते और नेक कार्य करते हैं।
संत पापा ने कहा कि यद्यपि उपवास का अभ्यास, धर्मग्रंथ की विशेषता अनुरूप और अहम के प्रलोभन से दूर, हमसे विश्वास और नम्रता की मांग करता है। यह ईश्वर के संग एकता में बने रहने की जरुरत को व्यक्त करता है क्योंकि वे जो ईश वचनों से पोषित होने के अयोग्य होते वे सच्चे अर्थ में उपवास नहीं करते हैं। हमारी आंतरिक निष्ठा, एक प्रत्यक्ष निशानी स्वरुप है जो कृपा के माध्यम पाप और बुराई से दूर होना है, उपवास में हम स्वार्थ का परित्याग करते हैं जो हमें एक साधरण जीवन शैली का अनुसरण करने को मदद करता है, चूंकि केवल तपस्या ही ख्रीस्तीय जीवन को मजबूत और सच्चा बनाता है।”
इस संदर्भ में, संत पापा ने एक अति व्यवहारिक और निरंतर अनुचित अभ्यास से अपने को दूर रखने का सुझाव दिया, हम अपने को उन शब्दों से दूर रखें जो बहुधा हमारे पड़ोसियों को दर्द और चोट पहुंचाते हैं। “आइए हम अपनी शब्दों पर नियंत्रण रखें, कड़े शब्दों और जल्दबाज़ी में फ़ैसला लेने से बचें, उन लोगों की बुराई करने और उनके बारे में बुरा बोलने से बचें जो हमारे बीच में उपस्थित नहीं रहते हैं, जो अपना बचाव नहीं कर सकते।” इसके बदले, हम अपने शब्दों का उचित चुनाव करें, और अपने परिवारों में, मित्रों के बीच, कार्य स्थलों में, संचार माध्यमों, राजनीतिक वाद-विवादों, मीडिया में और ख्रीस्तीय समुदायों में दया और सम्मान की भावना उत्पन्न करें। इस तरह, घृणा के शब्दों की जगह उम्मीद और शांति के शब्द स्थापित किये जायेंगे।
एकता
चालीसा हमें वचन सुनने और उपवास के सामूहिक पहल पर ज़ोर देता है। धर्मग्रंथ बाईबिल हमें इसे कई तरीकों में व्यक्त करता है। उदाहरण के लिए, नबी नहेम्या का ग्रँथ कहता है कि कैसे लोग संहिता का सार्वजनिक श्रवण करने हेतु जमा होते, उपवास के ज़रिए अपने विश्वास और पूजा आराधना की तैयारी करते, जिससे वे ईश्वर के संग अपनी विधान को नवीन कर सकें।
संत पापा ने कहा कि उसी भांति हमारे पल्लियों, परिवारों, कलीसियाई समुदायों और धर्मसमाज समुदायों को चाहिए कि वे चालीसा की अपनी यात्रा करें, जहाँ ईश्वर के वचनों को सुनना, गरीबों और पृथ्वी की पुकार, उनके जीवन का अंग बनता है, तथा उपवास करना उनके पश्चताप करने का एक ठोस नींव बनती है। इस संदर्भ में, मनफिराव सिर्फ हमारी अंतर आत्मा के संबंध में नहीं बल्कि हमारे संबंधों और वार्ता की ओर हमारा ध्यान इंगित करता है। यह हमें सच्चाइयों से चुनौती लेने और इस बात को पहचनाने में मदद करता है कि कसीसियाई समुदायों के अंदर न्याय और मेल-मिलाप के संबंध में हमारी चाहतों को कौन-सी बातें दिशा-निर्देशित करती हैं।
प्रिय मित्रों, आइए हम चालीसा की कृपा मांगें जो हमें ईश्वर और सबसे कमज़ोरों की ओर ध्यान देने में मदद करेगा। आइए हम उस शक्ति के लिए प्रार्थना करें जो उपवास से आती है, जो हमारी भाषा को भी अपने में सम्माहित करती है, ताकि चोट पहुंचाने वाले शब्द कम हों और दूसरों की आवाज़ के लिए ज़्यादा स्थान बने। आइए हम अपने समुदायों को ऐसी जगह बनाने की कोशिश करें जहाँ पीड़ितों की पुकार का स्वागत हो, और सुनना मुक्ति के मार्ग को प्रशस्त करें, जिससे हम प्रेम की सभ्यता बनाने में योगदान देने को उत्सुक और तैयार हो सकें।
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