"इन्पस्" के प्रबन्धकों एवं कर्मचारियों से सन्त पापा लियो
वाटिकन सिटी
वाटिकन सिटी, शुक्रवार, 10 अप्रैल 2026 (रेई, वाटिकन रेडियो): इटली की सामाजिक सुरक्षा सम्बन्धी राष्ट्रीय संस्था "इन्पस" के प्रबन्धकों और कर्मचारियों को सम्बोधित कर सन्त पापा लियो 14 वें ने शुक्रवार को राष्ट्रीय सम्पदा के समान वितरण तथा ज़रूरतमन्दों की गंभीर परिस्थितियों पर ध्यान केन्द्रित करने का आग्रह किया।
समान वितरण
सन्त पापा ने "इन्पस" के प्रबन्धकों एवं कर्मचारियों से कहा, "आपकी भूमिका एक ज़रूरी सामाजिक एवं संस्थागत भूमिका है, जिसमें आपको धन के समान बंटवारे के ज़रिए कई कमज़ोर लोगों की ज़रूरतों को पूरा करना होता है, विशेष रूप से, ज़रूरतमन्दों की गंभीर परिस्थितियों पर ध्यान देना होता है। इससे आपको एक ऐसी सामाजिक ज़िम्मेदारी को बढ़ावा देने में प्रभावशाली ढंग से काम करने का मौका मिलता है जो आर्थिक विकास और सामुदायिक एकता को जोड़ती तथा जन कल्याण हेतु निर्णय लेने में मदद करती है।"
सन्त पापा ने इस बात की ओर ध्यान आकर्षित कराया कि विश्व में धन की कमी नहीं है, फिर भी गरीबों की संख्या बढ़ रही है। उन्होंने कहा, "सम्पूर्ण विश्व में करोड़ों लोग निर्धनता की खाई में गिरे हुए हैं, जिनके पास भोजन, आवास, चिकित्सा व्यवस्था, शिक्षा, बिजली और पानी की आपूर्ति और ज़रूरी स्वास्थ्य सेवा भी उपलभ्य नहीं है, जबकि दूसरी ओर कुछ ही लोगों के हाथों में बहुत अधिक धन है। उन्होंने कहा कि यह एक ग़लत स्थिति है, जिस पर हम सवाल उठाए बिना नहीं रह सकते और इसे बदलने का पक्का इरादा कर सकते हैं।"
काथलिक कलीसिया
सन्त पापा लियो ने कहा कि ऐसा कोई तय फैसला नहीं है जो हमें ग़ैर-बराबरी की ओर ले जाए। ग़ैर-बराबरी की जड़ संसाधनों की कमी नहीं है, बल्कि संसाधनों के समान वितरण से समस्या को हल करने की ज़रूरत है।
सन्त पापा लियो 14 वें ने कहा कि काथलिक कलीसिया हमेशा से निर्धनों की ज़रूरतों पर ध्यान देती रही है तथा सभी से यह आग्रह करती है कि संसाधनों के समान वितरण में न्याय करें। उन्होंने 1891 में प्रकाशित सन्त पापा लियो 13 वें के विश्व पत्र रेरुम नोवारुम में मज़दूरों की स्थिति का उल्लेख करते हुए, सामाजिक सुरक्षा और सहायता की अहमियत का स्मरण दिलाया, ताकि "यह सुनिश्चित किया जा सके कि मज़दूर को कभी काम की कमी न हो और हर किसी की मदद के लिए पैसे मौजूद हों, न सिर्फ़ इंडस्ट्री में अचानक आने वाले संकटों में, बल्कि कमज़ोरी, वृद्धावस्था और दुर्घटना के मामलों में भी"।
मज़दूरों की प्रतिष्ठा
इसी प्रकार सन्त पापा ने सन्त जॉन 23 वें के सन् 1961 में प्रकाशित मातेर-ए-माजित्रा तथा सन् 1963 में प्रकाशित पाचेम इन तेर्रिस का स्मरण दिलया जिसमें सामाजिक सुरक्षा के अधिकार को स्पष्टतः मानवाधिकार का दर्जा दिया गया है, जैसे "बीमारी, विकलांगता, विधवावस्था, वृद्धावस्था, बेरोज़गारी आदि कारणों से जीविका के साधन खोने की किसी भी दूसरी स्थिति में सुरक्षा का अधिकार"।
इसी तरह सन्त पापा लियो 14 वें ने सन्त पापा पौल षष्टम के पोपुलोरुम प्रोग्रेसियो तथा सन्त जॉन पौल द्वितीय के लाबोरुम एसेरचेन्स, सोलिचितूदो रेई सोशालिस एवं चेन्तेसिमुस आन्नुस तथा सन्त पापा बेनेडिक्ट 16 वें के कारितास इन वेरितास विश्व पत्रों का स्मरण दिलाया जिनमें श्रमिकों के अधिकार और गरिमा पर बल दिया है। इनके अतिरिक्त सन्त पापा फ्राँसिस ने भी अपने विश्व पत्र फ्रातेल्ली तूती में इसी तथ्य की पुनरावृत्ति की है कि मज़दूरों को सामाजिक सुरक्षा दी जाना वास्तव में सार्वभौमिक अधिकार है।
"इन्पस" के प्रबन्धकों एवं कर्मचारियों से सन्त पापा लियो ने आग्रह किया कि वे ज़मीर, ज़िम्मेदारी और हाज़िरी के साथ इंसानियत से प्रेम करें और उसकी सेवा करें। जो काम करते हैं उनके लिए काम करें और खासकर उनका भी ध्यान रखें जो काम करना चाहते हैं लेकिन नहीं कर पाते, सबसे कमज़ोर लोगों की मदद करें ताकि किसी को भी यथार्थ मानवीय जीवन जीने के सम्मान और स्वतंत्रता की कमी महसूस न हो।
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