ईश्वर का सेवक कभी नहीं हारता
वाटिकन सिटी
इस पवित्र धर्मविधि के दौरान रोबेर्त्तो पसोलीनी, वाटिकन उपदेशक ने अपने चिंतन प्रस्तुत करते हुए कहा,
भाइयो और बहनों,
इस पवित्र दिन की धर्मविधि हमें प्रभु येसु के दुःखभोग पर चिंतन करने का निमंत्रण देती है। हमने अभी इसे गायन में सुना। मौत और महिमा के रहस्य के पूर्व, हमारे लिए शांतिमय ढ़ंग से प्रार्थना में सहभागी होना स्वाभाविक है। यदि हम इस घटना को एक अचानक हुई घटना के रूप में देखें, तो ख्रीस्त का क्रूस हमारी समझ से बाहर हो सकता है। वास्तव में, यह एक यात्रा का अंत है: एक जीवन की पूर्णता जिसमें येसु ने पिता की आवाज़ सुनी और उसे स्वीकारना सीखा, तथा स्वंय को प्रतिदिन उस प्रेम में बढ़ने दिया। इस यात्रा को समझने हेतु पुण्य सप्ताह के पूजन विधि पाठ हमें ईश सेवक के तथाकथित "भजनों" को सुनने का निमंत्रण देते हैं। ये कव्य भजन संहिता हैं जिनमें नबी इसायस ने एक रहस्यमय सेवक का स्वरूप जिक्र हैं जिसके माध्यम से ईश्वर दुनिया को बुराई और पाप से बचाते हैं। ख्रीस्तीय परंपरा ने इन भजन स्त्रोत में येसु के द्वारा लिये गए कदमों की एक हैरान करने वाली और नाटकीय झलक देखी है, जिसमें उन्होंने खुद को "दुखों से ग्रस्ति सेवक” स्वरुप प्रस्तुत किया जिसने “पापों का बोझ” को अपने ऊपर लेकर “खुद को मौत के हवाले कर दिया”।
पहल भजन स्तोत्र- सेवा का बुलावा और प्ररिताई
पहले भजन स्त्रोत में हम सेवक को ईश्वर के द्वारा चुने गये व्यक्ति के रूप में पाते हैं जिन्हें एक विशेष प्रेरिताई सौंपी गई है, एक अति सुन्दर प्रेरितिक कार्य- जहाँ वह अंधों को दृष्टि दान और बंदियों को मुक्ति का संदेश और अंधेरे में जीवनयापना करने वालों को ज्योति में लाने की चर्चा सुनते हैं। हम इसे दुःखियों, अन्याय और पाप में पड़े लोगों के लिए एक जीवनदायी कार्य स्वरूप घोषित पाते हैं। यद्यपि ईश सेवक इस प्रेरितिक कार्य को विशेष रूप में पूरा करता है- “वह अपनी आवाज ऊंची नहीं करता है, न ही गलियारों में पुकारता है। यह न तो कुचला हुआ सरकंडा ही तोड़ेगा और न धुआँती हूई बत्ती ही बुझायेगा।” हम उसमें कोई हिंसा, कोई दबाव को नहीं पाते हैं, और न ही नये रूप में शरू करने हेतु वह किसी चीज को नष्ट करता है। ईश्वर का सेवक अँधेरे में जीवन की खोज करता है। हम सब इस प्रेरिताई की जटिलता का अनुभव करते हैं। हम सभी निरंतर गुस्सा, हिंसा का सहारा लेने के प्रलोभन में पड़ जाते हैं, यह सोचते हुए कि ऐसा किये बिना, चीज़ें में कभी सुधार नहीं होगा। ईश्वर का सेवक ऐसी आदी बातों का शिकार नहीं होता है, वह अंधेरे की बुराई का सामना करने के लिए सिर्फ़ नम्रता को अपनी शक्ति स्वरूप देखते हैं।
दूसरा भजनः ईश सेवक की निराशा
वाटिकन उपदेशक ने कहा कि दूसरे भजन में, यद्यपि हम कुछ दरार को पाते हैं। अपनी इस प्रेरिताई को पूरा करने की कोशिश करने के बाद ईश सेवक यह अनुभव करता है कि उसके सारे प्रयास व्यर्थ हो गये हैं। वह कहता है,“मैंने बेकार ही काम किया है, मैंने व्यर्थ ही अपनी शक्ति खर्च की है” (49.4)। अच्छे बीज नहीं उगते हैं, सारी चीजें अपने में फंसी और अटकी जान पड़ती है। यह हमारे लिए एक संकट की भांति होता है जो ईश्वर का अनुसरण करने वाले को किसी न किसी स्थिति में निराश कर देता है। वास्तव में, यह सिर्फ एक अनूभूति है, क्योंकि ईश्वर के सेवक द्वारा किया गया कार्य अपने में व्यर्थ नहीं हुआ है, सिर्फ इतना ही कि उसकी मेहनत के फल को सत्यापित नहीं किया जा सकता है। अंधेरे में प्रवेश करते हुए ईश सेवक एक स्थल में निवास करता है जहाँ से चीजों को मापदंड के आधार पर नहीं समझा जा सकता है, लेकिन ईश्वर विरोधाभाव में अपनी मुक्ति योजना को संचालित करते हैं।
तीसरा भजनः आश्चर्य और चुनौती
तीसरे भजन में, हम आश्चर्य को उभरकर सामने आता पाते हैं: ईश सेवक को एहसास होता है कि जिन लोगों की वह मदद करना चाहता है, वे ही दुश्मनी, गुस्से और यहाँ तक कि हिंसा से प्रतिशोध करते हैं। असल में, वे जो अंधेरे में रहते हैं, वे हमेशा ज्योति का स्वागत नहीं करते: कभी-कभी वे उसका विरोध उसे रोकने की कोशिश करते हैं। क्योंकि ज्योति न सिर्फ़ उन चीज़ों को प्रकट करती है जो सुंदर हैं, बल्कि उन्हें भी दिखाती है जिन्हें हम छिपाना पसंद करते हैं, हमारे घाव, झूठ, हमारी उलझनें। और यह हमें भयभीत करता है। यद्यपि, ईश्वर का सेवक हार नहीं मानता है। वह प्रभु के बताए रास्ते पर चलता रहता है, बिना भागे: “मैंने मारने वालों के सामने अपनी पीठ कर दी, अपनी दाढ़ी नोचने वालों के सामने अपना गाल। मैंने अपमान करने और थूंकने वालों से अपना मुख नहीं छिपाया।” (इसा 50:6)।
चौथा भजनः ईश सेवा की दैयनीय स्थिति
आज की धर्मविधि में, चौथे भजन को हम कुछ चिंताजनक होती है। ईश सेवक पर होने वाली हिंसा इतनी गहरी होती है कि उसका चेहरा बिगड़ जाता है, उसे पहचाना नहीं जा सकता; उसका कोई रूप नहीं रहता, कोई सुंदरता नहीं रह जाती है। इसके बावजूद, इस मार्ग में चलते हुए, वह इस बात को सीखता है कि जो बुराई उसे मिली है, उसका बदला नहीं लेना चाहिए। जब बुराई हम पर हमला करती है, तो हमारा मन हमेशा प्ररिशोध करना चाहता है, उसे पीछे धकेलने, कम से कम हिसाब बराबर करने की सोचता है। हालाँकि, सेवक इस तर्क के आगे नहीं झुकता: वह बिना हिंसा उत्तर दिए सब कुछ सह लेता है। बुराई उस तक पहुँचती है और वहीं रुक जाती है, इसीलिए "उसने बहुतों के पाप अपने ऊपर लेते हुए अपने को बलि चढ़ा दिया।” (इसा. 53. 12)।
बुराई के दो मार्ग- समर्पण या बदला
भाइयो और बहनों, वाटिकन उपदेशक पसोलीनी ने कहा कि प्रभु येसु ने इन भजनों को सिर्फ नहीं सुना। बल्कि वे उन्हें अपने में परिभाषित करते हुए अपने जीवन में पूरी तरह से जीते हैं, उन्होंने अपने पिता की इच्छा पर पूर्ण भरोसा रखते हुए, दुनिया को बचाने हेतु अपने को सूली पर टंगने दिया। दुनिया, बुराई का सामना करने में सिर्फ़ दो रास्तों को जानती है- अपने को समर्पित करना या उसका बदला लेना। हम इसे लगातार युद्धों, विभाजनों और हमारे सभी रिश्तों पर लगे ज़ख्मों स्वरुप देखते हैं। बुराई इसलिए फैलती है क्योंकि हमेशा कोई न कोई मिल जाता है जो उसका बदला लेना और उसे बढ़ाने को तैयार रहता है। येसु ने इस ज़ंजीर को अपनी बड़ी ताकत से नहीं तोड़ा, बल्कि सारी चीजों को स्वीकार करते हुए, अपने दुःखों में उस प्रेम और सेवा के मूल्यों को पहचानते हुए जिन्हें पिता ने उनके लिए सौंपा था। उन्होंने भविष्यवाणियों को ठोस कार्यों के द्वारा, क्षमादान, शांति और करूणा में बने रहते हुए पूरा किया। इस तरह, क्रूस के रास्ते पर चलते हुए, उन्होंने सबसे मुश्किल आज्ञाकारिता सीख ली: अपने शत्रुओं को भी प्रेम करना चाहे वे बुराई क्यों न करते हों।
मानवता की स्थिति
पसोलीनी ने कहा हम एक ऐसी दुनिया में रहते हैं जहाँ ईश्वर की आवाज़ मानवता का दिशा-निर्देशन पहले की तरह नहीं करती है, जैसे की होता था। इसलिए नहीं कि ईश्वर की आवाज़ कमजोर हो गई है, बल्कि इसलिए कि यह बहुत-सी आवाज़ों- सुरक्षा, तरक्की और भलाई का वादा करने वाले दूसरे शब्दों के बीच दब जाती है। आज, ये वो इशारे हैं जो कई चुनाव को निर्देशित करते हैं और हमारी ज़िंदगी का रास्ता निर्धारित करते हैं। फिर भी, दुनिया आज एक ऐसी जगह बनी हुई है जहाँ लोग बिना किसी गलती या कारण के दुःख सहते और मरते हैं। यद्धें नहीं रुकतीं, अन्याय बढ़ता जाता है, और सबसे कमज़ोर लोग को इसकी बड़ी कीमत चुकानी पड़ी हैं। ऐसा लगता है जैसे मानवता के सफर को समेट कर रखने वाला कोई शब्द गायब हो गया हो। फिर भी, ऐसी परिस्थिति में, अगर हम ध्यान से देखें, तो हम कुछ हैरान करने वाली बातें देख सकते हैं: लोगों का एक शांत समूह जो एक अलग आवाज़ को सुनने का चुनाव करता है। कुछ लोग इसे स्पष्ट रुप में ईस्वर की इच्छा के रुप में देखते हैं, वहीं दूसरे इसे अपनी अंतरात्मा से निकलती एक गहरी और आवश्यक आवाज़ के तौर पर सुनते हैं। यह एक ऐसी आवाज़ है जो शोर नहीं मचाती, जो ज़बरदस्ती खुद को नहीं थोपती है, जो सस्ते वादे नहीं करती है। यह एक शांत और ज़िद्दी संगीत है, जो हमें प्रेम करने का निमंत्रण देती, साथ रहने और मिले दुःख के बदले दुःख नहीं देने का आहृवान करती है।
ईश सेवकों का एक अलग दल
कुछ लोग इस गीत को सुनने का चुनाव करते हैं। ये वे हैं जो कभी-कभी अनजाने में ही, प्रभु के सेवक के रास्ते पर चलते हैं। वे कोई खास काम नहीं करते। वे बस हर दिन उठते हैं और अपनी ज़िंदगी को कुछ ऐसा बनाने की कोशिश करते हैं जिससे न सिर्फ़ उन्हें, बल्कि दूसरों को भी लाभ होता है। वे ऐसे बोझ उठाते हैं जिनका चुनाव उन्होंने नहीं किया है, वे बिना कठोरता के ज़ख्मों को गले लगाते हैं, वे अच्छाई की तलाश करना तब भी नहीं छोड़ते जब चीजें बेकार लगती हैं। वे शोर नहीं मचाते हैं, वे मंच पर नहीं बैठते, लेकिन वे एक अलग दुनिया की चाह रखते हैं। उन्हीं की वजह से बुराई आखिरी शब्द नहीं है और इतिहास हिंसा की तरफ़ नहीं बढ़ रहा है। लोगों की यह भीड़ इस बात की गवाही देती है कि उस ईश सेवक के गाने, जिससे ईश्वर खुश हैं, इंसान के दिल में गूंजित होते रहे, वे सिर्फ किसी ऐसे व्यक्ति का इंतज़ार करते हैं जो उन्हें अपनी ज़िंदगी के ठोस परिणामों में बदल दे, भले ही इसका मतलब क्रूस उठाना ही क्यों न हो।
दिल के हथियार छोड़ें
थोड़े ही समय में हम इशारों, चुप्पी और प्रार्थना के साथ प्रभु के क्रूस की आराधना करेंगे। यह ईश्वर के रहस्य को जानने और सब के लिए उनके प्रेम के गुण- कमज़ोर और शक्तिशाली- लोगों के संग खुद को साझा करने का एक खास मौका होगा। अगर हम इस धर्मविध को सिर्फ़ एक औपचारिकता तक सीमित रखना चाहते हैं, तो हम कम से कम अपने दिल की गहराई में, उन हथियारों को अपने से दूर रखने का फ़ैसला कर सकते हैं जो अभी भी हमारे हाथों में हैं। शायद वे दुनिया के ताकतवर लोगों द्वारा इस्तेमाल किए जाने वाले हथियारों की भांति खतरनाक न हों। फिर भी, वे भी मौत के हथियार हैं, क्योंकि वे हमारे रोज दिन के रिश्तों को कमज़ोर, घायल करने, हमारे प्रेम को अर्थहीन और खोखला बनाने के लिए काफ़ी हैं।
कल की तरह आज भी, दुनिया को बचाने की ज़रूरत है: बुराई की हिंसा से, उस नाइंसाफ़ी से जो कत्ल करती है, उस बँटवारे से जो अपमान करता है। लेकिन यह मुक्ति ऊपर से नहीं आएगी, न ही इसे राजनीति, आर्थिक या सैन्य फ़ैसलों से सुनिश्चित किया जा सकता है। दुनिया लगातार उन लोगों से बचती है जो ईश सेवक के गीतों को अपनी ज़िंदगी का हिस्सा मानने को तैयार रहते हैं। प्रभु येसु ने यही किया: उन्होंने पिता की इच्छा को गंभीरता से लिया, उसे एक ऐसे गीत बनाया जिसे आखिर तक “ऊँची आवाज़ में पुकार कर और आँसू बहाकर” (इब्रानियों 5:7-8) गाया जाना था। इसी वजह से, अपनी गिरफ़्तारी के अहम पल में, उन्होंने यह घोषणा की कि: “मैं ही वह हूँ" (योह. 8:5), ताकि वह अपने प्रेम के दूःखभोग में स्वतंत्र रुप में प्रवेश कर सके।
क्रूस के मूल्य की मांग
भाइयो और बहनों, आज शाम हमें भी क्रूस के मूल्य को देखते हैं। हम इसे आसानी से अपना सकते हैं अगर हम यह मान लें कि ऐसी कोई मुश्किल हालात नहीं है जिसका सामना नहीं किया जा सकता, हम किसी पर दोष नहीं लगा सकते हैं, कोई दुश्मन नहीं है जो हमें प्रेम और सेवा करने से रोक सके। इसके बदले, हम यहाँ हैं, बुराई का बदला नहीं लेने हेतु, कठिनाई में सब्र रखने के लिए, उस परिस्थतियों में भी विश्वास करने को जब अंधेरा अच्छाई को निगलता प्रतीत होता है, इस भांति हम दिन-ब-दिन ऐसे सेवक बन सकते हैं जिनके द्वारा ईश्वर दुनिया में मुक्ति लाना चाहते हैं।
हमारे समय में, जहाँ आज भी हम नफ़रत और हिंसा को पाते हैं, जहाँ युद्धों और मौत के फ़ैसलों को सही ठहराने के लिए ईश्वर का नाम भी लिया जाता है, हम ख्रीस्तीयों को बिना किसी डर से, असल में “पूरे भरोसे के साथ” (इब्रा. 4:16) प्रभु के क्रूस के पास जाने को कहा जाता है, यह जानते हुए कि यह वह सिंहासन है जिस पर हम बैठते और उनके संग राज करना सीखते हैं, अपनी ज़िंदगी दूसरों की सेवा में अर्पित करते हैं। अगर हम “अपने विश्वास के प्रतिज्ञा पर मज़बूती से बने रहें” (इब्रा. 4:14), तो हमारे दिन भी खुशी और दुःख के स्वर बनेंगे, क्रूस का वह रहस्यमयी गाना जिसमें सबसे असीम प्रेम की सुर सुनाई पड़ती है।
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