संत पापा- सुसमाचार परंपरा और उसके नवनीकरण का प्रभाव
वाटिकन सिटी
संत पापा लियो 14वें ने अपने बुधवारीय आमदर्शन समारोह के अवसर पर संत पेत्रुस महागिरजाघर के प्रांगण में एकत्रित सभी विश्वासियों और तीर्थयात्रियों का स्वागत करते हुए कहा, प्रिय भाइयो एवं बहनों सुप्रभात और सुस्वागतम्।
विश्व पत्र मिदियेटर देई में, आराध्य संत पापा पियुस 12वें लिखते हैं, “इसमें संदेह नहीं कि कलीसिया एक जीवित ईकाई है, और इस सजीव ईकाई स्वरुप, पवित्र धर्मविधि के संदर्भ में भी वह विकसित होती, प्रौढ़ता को प्राप्त करती, प्रगति करते हुए समय की आवश्यकताओं और परिस्थितियों के अनुरूप अपने को ढ़ाल लेती है, बशर्त की धर्मविधि के धर्मसिद्धांत की देख-रेख की जाती हो।”
धर्मसभा का अभियोजन
इस सिद्धांत के पूर्ण अनुपालन में, द्वितीय वाटिकन महासभा, धर्मसिद्धांत सक्रोसंतुम कोन्सिलुम के परिचय में इस बात का उल्लेख किया गया है, “धर्मविधि में सुधार और उसे बढ़ावा देने के लिए खास तौर पर ठोस कारणों का पहचान किया जाता है।” वास्तव में, धर्मसभा के अभियोजन का उद्देश्य “विश्वासियों को ख्रीस्तीय जीवन जीने हेतु एक उत्साह प्रदान करना है, समय की माँग के अनुरूप संस्थानओं में परिवर्तन पर ध्यान देना, उन बातों को बढ़ावा देना जो ख्रीस्त विश्वासियों में एकता की भावना को प्रोत्साहित करती हो, तथा सारी मानव जाति को कलीसिया में संग्रहित करने वाली बातों को मजबूती प्रदान करना है।
संत पापा लियो ने कहा कि इतिहास के उस क्षण में, धर्मविधि के क्रिया कलापों में नवनीकरण लाने हेतु एक गहरी आवश्यकता की अनुभूति हुई, जिसके द्वारा सदियों तक कलीसिया ने ईश्वर की माहिमा और ख्रीस्तीयों के पवित्रीकारण हेतु कार्य किया। हम धर्मविधि के संबंध में हुए आंदोलन के प्रति कृतज्ञता के भाव प्रकट करते हैं, जिनके द्वारा विश्वास में सुदृढ़ता आई- जिसके संबंध में संत पापा जोन पौल द्वितीय ने बाद में कहा कि धर्मविधि और कलीसियाई जीवन के नवीनीकरण के बीच एक अति घनिष्ट और मूलभत संबंध है। कलीसिया पूजन-विधि में न केवल कार्य करती है बल्कि इसके द्वारा खुद को प्रकट भी करती है, वह पूजन-विधि के द्वारा जीवित रहती और अपने जीवन के लिए शक्ति हासिल करती है।”
अच्छी परंपरा बनाये रखें
संत पापा लियो ने कहा कि विश्वासियों को धर्मविधि में मिलने वाली समृद्ध कृपादानों की ओर अभिमुख करने हेतु धर्मसिद्धांत सक्रोसंतुम कोन्सिलुम एक प्रभावकारी वाक्यांश कहता है, “अच्छी परंपरा को बनाए रखा जाये, यद्यपि उसमें संवैधानिक विकास का मार्ग खुला रहे।”
संत पापा बेनेदिक्त 16वें ने इस घोषणा में निहित उद्देश्य को समझा, जो धर्मसभा के आचार्यों में “नवीनता हेतु कार्याक्रम” को व्यक्त करता है, “परंपरा से चली आ रही बृद्ध धर्मविधि और भविष्य की धर्मविधि के मध्य एक संतुलन”, इस बात का ध्यान रखते हुए कि “परंपरा और प्रगति बहुधा बेढ़ंग रूप में विरोधात्मक होते हैं”, जबकि, वास्तव में, दो तत्थों का मिलन होता हैः परंपरा अपने में एक सजीव सच्चाई है,जो अपने में विकास के सिद्धांत को वहन करती है। यह मानो, यह कहने की भांति है कि परंपरा की नदी स्वयं में स्रोत को वहन करती और अपने में बाहर की ओर बहती है।
पूजन-विधि में परिवर्तन
संत पापा लियो ने कहा कि धर्मसभा इस प्रगति की वैधता को सुदृढ़ता प्रदान करती है, जो वास्ताविक परंपरा से जड़ी हुई है, पूजन-विधि में “ईश्वर द्वारा स्थापित अपरिवर्तनीय तत्वों” और “परिवर्तनशील तत्वों” में अंतर स्थापित करते हुए, “जो समय के साथ न केवल बदले जा सकते हैं, बल्कि बदले भी जाने चाहिए, अगर उनमें किसी ऐसी चीज़ का प्रवेश हो गया है जो पूजन-विधि के अंदरूनी स्वभाव से मेल नहीं खाती या उसके लिए अनुपयुक्त हो गई है।” इस तरह के परिवर्तनों को सदियों में निरंतर देखा गया है, जिनके द्वारा विश्वासियों की सहभागिता- धार्मिक क्रिया कलापों में, ख्रीस्त के पास्का रहस्य में- फलदायक बना सकें, जो ख्रीस्तीय विश्वास का मूलभूत आधार है। कलीसिया की आराधना इस भांति हर युग के सांस्कृतिक स्वरूपों को अपने में वहन करती है और उन्हें प्रभावित करते हुए उन्हें परिवर्तित भी करती है। इस तरह धर्मविधि, सदियों से हमारे लिए सुसमाचार प्रचार करने का एक साधन है। आज, हमारे लिए इस शक्ति को वर्तमान सच्चाई और सजीव काथलिक परंपरा के अनुरूप नवीन बनाने की जरूरत है, अर्थात इस आयाम के संग जो विश्वासियों को पूर्ण सत्य की खोज हेतु प्रेरित करता हो।
धर्मविधि में नवनीकरण सावधानी पूर्वक
संत पापा ने कहा कि अतः हम इस बात को समझते हैं कि क्यों धर्मसभा के आचार्यों ने धर्मविधि के पुनरावलोकन की बात कही, जब “सच्ची कलीसिया की भलाई हेतु उसकी जरुरत निश्चित रुप में होती है”, यहाँ हमें इस बात का ध्यान रखना होगा कि “अपनाया गया कोई भी नया रूप किसी न किसी तरह पहले से मौजूद रूपों से ही स्वाभाविक रूप में विकसित होती हो।” सम्पूर्ण कलीसिया की भलाई हेतु, हर नवनीकरण को चाहिए कि वह सदैव सावधानीपूर्णक ईशशास्त्रीय, इतिहास और प्रेरिताई की खोज करें। धर्मसभा का धर्मसिद्धांत, इस भांति हमें विश्वासियों के बीच भम्र को दूर करने की बात कहता है, यह हर किसी को सम्माहित करने हेतु प्रोत्साहित नहीं करता, धर्मविधि के संबंध में उन बातों को हटाने या बदलने की बात कहता है जो व्यक्तिगत पहल से शुरू की गई है। धर्मसिद्धांत में प्रगति कलीसिया की एकता से कोई समझौता नहीं करना है: बल्कि, यह उसे सुदृढ़ करने और उसे बढ़ावा देने की कोशिश करती है।
पूजन-विधि का सम्मान करें
संत पापा ने कहा, अतः मैं उन सभो लोगों से निवेदन करता हूँ जो दिव्य रहस्य के समारोह मनाने हेतु तैयारी करते हैं, विशेषकर पुरोहितों के लिए जो धर्मविधि की अगुवाई करते हैं, पूजन-विधि के पाठ और नियमों के प्रति हमेशा सम्मान को बनाए रखें जो आंतरिक खुलेपन और ईश्वर में भरोसा से उत्पन्न होते हैं, जिसमें हम ईश्वर की महानता के सामने विनम्रता और कलीसिया के प्रति सच्ची निष्ठा को व्यक्त करते हैं।
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