जर्मन काथलिक संघों के छात्रों से सन्त पापा लियो
वाटिकन सिटी
वाटिकन सिटी, शुक्रवार, 5 जून 2026 (रेई, वाटिकन रेडियो): जर्मनी के काथलिक विद्यार्थियों के संघों के प्रतिनिधि छात्रों ने शुक्रवार को वाटिकन में सन्त पापा लियो 14 वें का साक्षात्कार कर उनका सन्देश सुना।
जर्मन काथलिक छात्रों का अभिवादन कर सन्त पापा लियो ने कहाः आद पेत्री सेदेम अर्थात् पेत्रुस के के सिंहासन, रोम तक आने का आपका फ़ैसला उस काथलिक विश्वास से प्रेरित है जो आपकी प्रभु येसु के शिष्यों के तौर पर जोड़नेवाली सहभागिता तथा आपकी सांस्कृतिक गतिविधियों को परिभाषित करता है।
काथलिक पहचान
जर्मन काथलिक संघों के छात्रों की काथलिक अस्मिता बारे में सन्त पापा ने कहा कि विश्वास में उनका दृढ़ समर्पण उनके संघों के चार सिद्धान्तों में समाहित है जो उनका मार्गदर्शन करते हैं और ये हैं, धर्म, विज्ञान, मैत्री और मातृभूमि। सन्त पापा ने कहाः अतीत की तानाशाही और विचारधाराओं के समक्ष, काथलिक धर्म कभी भी सिर्फ़ दिखावा या लेबल नहीं रहा, बल्कि यह विश्वविद्यालयों और अन्य कार्य स्थलों पर साझेदारी का एक तरीका रहा है। सुसमाचारी ख़मीर की तरह, आपका भ्रातृसंघ वैज्ञानिक और राजनैतिक वातावरण सहित अलग-अलग अकादमिक, व्यावसायिक, और सामाजिक दायरों में भी बढ़ता रहता है। आपकी गतिविधियों का सामुदायिक पहलू न सिर्फ आपके देश को, बल्कि सम्पूर्ण यूरोप को लाभ पहुंचाता है, जिसका केन्द्र जर्मनी है।
इन्सानियत का अध्ययन ज़रूरी
सन्त पापा ने कहा कि इस भौगोलिक केन्द्रीयता के साथ आप उचित ही मानव व्यक्ति की सांस्कृतिक केन्द्रीयता को जोड़ते हैं, जो ईश्वर की सृष्टि और स्वयं अपने जीवन का निर्माता है। उन्होंने छात्र संघों के सदस्यों से कहा कि शिल्पवैज्ञानिक क्रांति की चुनौतियों का सामना करते हुए, आपको हमारी आम इंसानियत के अध्ययन और उसे प्रोत्साहित करने पर विशेष ध्यान देना चाहिए।
सन्त पापा ने कहा कि जैसे तर्क का इस्तेमाल होता है, वैसे ही विश्वास की रोशनी भी आज के समय के वादों और धोखे को रोशन करती है, और हर इंसान से एक न्यायपूर्ण और शांतिपूर्ण समाज के निर्माण में सहायता देने का हर सम्भव प्रयास करने की मांग करती है।
ज़िम्मेदार प्रबन्धक बनें
अध्ययन अध्यापन के अतिरिक्त, विविध सांस्कृतिक गतिविधियों में संलग्न छात्रों से सन्त पापा ने कहा कि इनसे उन्हें अवश्य ही यह अनुभव हुआ होगा कि यह सिर्फ़ एक व्यावसाय को आगे बढ़ाने का मामला नहीं है, बल्कि एक बुलाहट या मिशन का अनुसरण है। उन्होंने कहा कि सत्य की तलाश एक सर्वोत्तम चीज़ है जिसकी चाह रखना तथा जिसे प्रोत्साहन देना आवश्यक है।
सन्त पापा ने कहा अध्ययन का कोई भी क्षेत्र मात्र अंदाज़ा नहीं बन सकता, ठीक इसलिए कि इसमें बुद्धि और इच्छा दोनों का इस्तेमाल होता है। उन्होंने कहा, अध्ययन एक समर्पण है, जो आत्म अनुशासन और मनपरिवर्तन की मांग करता है: मन का रूपान्तरण जिसके द्वारा हम अपने काम के अस्त्रों को बेहतर बनाकर उपजाऊ मिट्टी की तरह उगाते हैं तथा अपने उत्तम कार्यों के माध्यम से, केवल धन पर केन्द्रित रहनेवाले व्यावसाय के बहकावे में आए बिना, समाज में ज़िम्मेदार प्रबन्धक बनते हैं।
“इंसान की इकोलॉजी” विकसित करें
जर्मनी के समस्त काथलिक छात्रों को सन्त पापा लियो 14 वें ने आमंत्रित किया कि वे यह स्वीकार करें कि संस्कृति मानवता की भलाई है: सत्य हमें स्वतंत्र करता जबकि झूठ और मिथ्यावादिता नामों और चीज़ों को भ्रष्ट कर देती है। उन्होंने कहाः लोगों को और विशेष रूप से निम्न, ग़रीब या बीमार लोगों को अमानवीय बनाने वाली चीज़ों के समक्ष मैं आपसे ख्रीस्तीय मानवतावाद के गवाह बनने का आग्रह करता हूँ। इस सन्दर्भ में, आपके एसोसिएशन के एक जाने-माने पूर्व सदस्य सन्त पापा बेनेडिक्ट 16 वें की कही बात पर गहराई से विचार करने हेतु आपको आमंत्रित करता हूँ, जिन्होंने 2011 में बुन्डेसटाग को सम्बोधन में कहा थाः एक सुसंगत “इंसान की इकोलॉजी” विकसित करें। इंसान का भी एक स्वभाव है जिसका सम्मान अनिवार्य है।”
विश्व अर्थों से परिपूर्ण
अन्त में सन्त पापा फ्राँसिस के विश्वपत्र लाओदातोसी का स्मरण दिलाते हुए सन्त पापा ने कहाः अखण्ड इकोलॉजी या पारिस्थितिकी इस तथ्य को प्रकाशित करती है कि यह विश्व अर्थों से परिपूर्ण है, यह कोई बेजान चीज़ नहीं है जिसे अपनी मर्ज़ी से या सत्ता की हवस से बनाया जा सके। वस्तुतः, हम अंशों के बेतरतीब समूह नहीं हैं, बल्कि ऐसे शरीर हैं जो पारलौकिकता के लिए खुले हैं: जीवन और न्याय, ज्ञान और प्रेम के लिए अपनी प्यास को दिशा देकर, हम एक साथ जानने, करने और विश्वास करने में सत्य की पुनर्खोज करते हैं।
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