संत पापा लियोः धर्मविधि में हमारी सहभागिता सक्रिय हो
वाटिकन सिटी
संत पापा लियो ने अपने बुधवारीय आमदर्शन समारोह के अवसर पर संत पेत्रुस महागिरजाघर में एकत्रित सभी विश्वासियों और तीर्थयात्रियों का अभिवादन करते हुए कहा, प्रिय भाइयो एवं बहनों।
संत पापा लियो 14वें ने बुधवारीय आमदर्शन समारोह में, वाटिकन द्वितीय धर्मसभा के आचार्यों द्वारा धर्मविधि के नवीनीकरण के संदर्भ पर चिंतन करते हुए सक्रोसंतुम कोनचिलियुम पर अपनी धर्मशिक्षा का समापन किया।
सक्रोसंतुम कोनचिलयुम पर अपनी अंतिम धर्मशिक्षा माला में, आज मैं इस बात पर चिंतन करना चाहूँगा कि धर्मसभा के आचार्यों ने धर्मविधि के संबंध में नवनीकरण की चाह क्यों रखी। इस संदर्भ में, धर्मसभा का तृतीय पत्र, जिसे कार्डिनल जोवान्नी बत्तिस्ता मोंतीनी जो उस समय मिलन के महाधर्माध्यक्ष थे, 28 अक्टूबर 1962 को अपने कलीसियाई विश्वासियों ने नाम प्रेषित किया, हमारे लिए विशेष रूप से प्रकाशित करता है। धर्मविधि, उन्होंने लिखा, “एक ईमानदारी पूर्ण दिव्य और मानवीय अभिव्यक्ति है। यह एक भाषा है। वहीं, यह दिव्य शिक्षण हेतु एक वाहन है, तो दूसरी ओर, यह ईश्वर से वार्ता में एक आवाज है। यह स्पष्ट है कि यह अपने शिक्षण कार्य का परित्याग नहीं कर सकती है, न ही यह आस्था और भक्ति को अपनी समझ में आने का मौका देने में नाकाम हो सकती है।” इन सारी बातों से विश्वस्त, भविष्य में नियुक्त होने वाले संत पापा पौल 6वें ने इस बात की सुनिश्चितता जताई कि विश्वासीगण “अपने में शांत और निष्क्रिय नहीं रह सकते हैं। उनकी भौतिक उपस्थिति को आध्यात्मिक अनुपस्थिति से संयुक्त नहीं किया जा सकता है।”
विश्वासियों से माँग
इन दोनों वाक्यों के बीच की सामानता जिसे हम वाटिकन द्वितीय धर्मसभा के साक्ष्य की संख्या 48 में पाते हैं- “कलीसिया...ख्रीस्त के विश्वासियों से यह सविनय चाह रखती है, जब वह विश्वास के इस रहस्य को प्रस्तुत करती है, कि वे अपने में अपरिचितों या मूकदर्शकों की भांति नहीं रह सकते हैं, इसके विपरीत वे प्रार्थनाओं और पूजन विधियों की अच्छी समझ के माध्यम, इस सचेतना में कि वे क्या कर रहे हैं, भक्ति और पूरे सहयोग में उन पवित्र कार्यों में सहभागी हो सकते हैं। उनका दीक्षांत ईश वचनों के अनुरूप हो और वे ईश्वर की मेज में सहभागी होते हुए उनके शरीर से पोषित होते हों, वे निर्मल बलि अर्पित करते हुए ईश्वर के प्रति कृतज्ञता के भाव अर्पित करें, केवल पुरोहित के हाथों द्वारा नहीं बल्कि उनके द्वारा, वे अपने को भी अर्पित करना सीखें, ख्रीस्त की मध्यस्थ द्वारा, वे दिन-ब-दिन ईश्वर और एक-दूसरे के संग एक गहरी एकता में प्रवेश करें, जिससे ईश्वर अपने में सर्वसर्वो हों।” इस शब्दों में धर्मविधि के मूल्य की एक नवीन चेतना अभिव्यक्त होती है। कलीसिया के धार्मिक अनुष्ठानों में, जहाँ हम मुक्ति की यादगारी मनाते पाते हैं, हमें एक अवसर मिलता है जहाँ हम ईश्वर के संग एक सच्चे संबंध को अनुभव करते हैं, जहाँ हमारा मिलन मुक्ति की घटना से होती है। चूंकि निशानियाँ और पवित्र धर्मविधि के वचन को समझने हेतु हम जटिलता का अनुभव करते हैं, विश्वासियों की सहभागिता अपने में निष्क्रिय नहीं हो सकती है।
धर्मविधि दिव्य विनिमय का स्रोत
धर्मसभा नवनीकरण, जिसे हम केन्द्र-बिंदु में रखते हैं, जो कलीसियाई हृदय का अनुभव होता है, का उद्देश्य धर्मविधि को चमकदार बनाने का था “जो हमारे लिए दिव्य विनिमय का मुख्य स्रोत है जिसके द्वारा ईश्वर हमारे संग वार्ता करते हैं।” इस विश्वास से इस बात की उत्पत्ति हुई कि धर्मग्रंथ के समृद्ध पदों और प्रार्थनाओं को विश्वासियों के लिए और सुगम बनाया जाये, और साथ ही समारोह की सूची को क्रमबंद करना जिसका उपयोग धर्मविधि की पुस्तकों में उस समय किया जाता था।
वास्तव में, चूंकि धर्मविधि एक सजीव घटना है, यह सदियों से हमेशा विकासित और परिवर्तनों का शिकार हुई है। धर्मसिद्धांत ने विभिन्न युगों की आवश्यकता अनुसार अपने स्वरुपों को अपनाया है। इस भांति, यह हमारे लिए कोई आश्चर्य की बात नहीं है कि द्वितीय वाटिकन ने भी, विरासत की परंपरा का पूर्ण सम्मान करते हुए, और विशेष कर इसे और अधिक पहुंच के योग्य बनाने हेतु, इस बात पर विचार-मंथन किया कि धर्मविधि की पुस्तकों में सुधार करना जरूरी है।
धर्मविधि में परिवर्तन की स्थितियाँ
संत पापा लियो 14वें ने कहा कि धर्मसभा के आचार्यों के दिमाग में जो बातें थी उसे धर्मसिद्धांत साक्रोसंतुम कोनचेलियुम की संख्या 21 में वर्णन किया गया है, “ख्रीस्तीय लोग पवित्र धर्मविधि से निश्चित रूप में कृपाओं को प्रचुर मात्रा में प्राप्त करें, पवित्र माता कलीसिया इस बात की चाह रखती है कि धर्मविधि के सामान्य पुनर्स्थापना में विशेष ध्यान दे। क्योंकि पूजा-पाठ में ऐसे तत्व होते हैं जो बदलते नहीं हैं, जो ईश्वर के द्वारा बनाये गये हैं, इसके साथ ही हम इसमें उन तत्वों को भी पाते हैं जो बदलते हैं। ये चीजें नहीं बदल जा सकती हैं लेकिन उन्हें समय के साथ बदलने की जरूरत है यदि उन्हें धर्मविधि की अंदरूनी प्रकृति से मेल न खाने वाली किसी चीज़ के अवरोध का सामना करना पड़ता हो या वे उसके लिए सही नहीं रहे हैं। इस पुनर्स्थापन में, पदों और धार्मिक क्रियाकलापों दोनों को इस तरह से बनाया जाना चाहिए कि वे अधिक स्पष्ट रूप में उन पवित्र चीजों की अभिव्यक्ति हों जिनकी ओर वे इंगित करते हैं, ख्रीस्तीय जन, जहाँ तक संभव हो सके, उन्हें सरल रूप में समझने के योग्य हों और उनमें सक्रिय रुप से पूर्णरूपेण सहभागी होते हों, और उससे एक समुदाय को लाभ होता हो।” धर्मविधि में अंतर- धर्मविधि के भीतर, दिव्य के मध्य, अपरिवर्तनीय तत्वों और मानवीय बातों में, इसके बदले, “विभिन्न चीजों में बदलाव की स्वीकृति” जैसे कि समय की आवश्यकता, परिस्थिति और आत्माओं के हित में जरूरी, और जैसे कि कलीसियाई पदानुक्रम, जो पवित्र आत्मा के निर्देशन में होता हो”, संत पापा पियुस 11वें के विश्वपत्र मेदियातोरे देई को जाता है।
सामान्य नवनीकरण की उत्पत्ति
संत पापा लियो 14वें ने कहा कि इसके साथ ही, “सामान्य नवनीकरण” की चाह अचानक उत्पन्न नहीं हुई, बल्कि इसे बीसवीं सदी के शुरु से ही धर्मविधि आंदोलन में देखा गया था, जो एक के बाद एक संत पापाओं के कामों में स्पष्ट झलक रही थी। इस बात पर बल देना कि विश्वासगण समारोह में, “अपरिचितों या मूकदर्शकों” की भांति सहभागी न हों, यह पहले ही संत पापा पियुस 11वें के समय प्रेरितिक प्रबोधन धर्मसिद्धांत दिभीनी कुलतुस” में उठाई गयी थी। इसके साथ ही, पवित्र सप्ताह की धर्मविधियों के क्रम में, कोई भी संत पापा पियुस 11वें के हस्तक्षेप की याद कर सकता है, जिसे उन्होंने पास्का की घटनाओं के अनुष्ठान को पुनः व्यवस्थित किया, जिसका अनुष्ठान सदियों से प्रातःकलीन किया जाता था। इन बातों को भी भूला जा सकता है कि संत पापा जोन 13वें ने प्रातःकालीन प्रार्थनाओं और मिस्सा-ग्रंथ को, मोतू प्रोपियो रूबिरिकारूम इन्सत्रुकतुम Rubricarum instructum के माध्यम 25 जुलाई 1960 को सरल बनाया था, जिसमें उन्होंने धर्मविधि में सुधार के लिए बुनियादी सिद्धांतों के प्रस्ताव की व्याख्या की थी।
संत पापा लियो ने कहा कि इस भांति द्वितीय वाटिकन महासभा द्वारा धर्मविधि में नवनीकरण को प्रोत्साहित करना कलीसिया के सक्रिय परंपरा में आधारित है। इसकी सही समझ हमें कलीसिया के निश्चित भागों में वाटिकन महासभा के उपरांत प्रचलित कुछ बातों का परित्याग करने को मदद करती है जो दुरूपयोग स्वरूप रही, जो दुर्भाग्यवश आज भी कभी-कभी ऊभर कर आती हैं, जहां सुधार के पीछे कुछ सिद्धांतों को बहुत ज़्यादा बढ़ा-चढ़ाकर बताया गया है या उन्हें गलत समझा गया है।
धर्मविधि कलीसियाई समारोह हैं
इस संदर्भ में, हमारे लिए धर्मसभा के सिद्धांत में इस बात को याद करना उचित होगा कि “धर्मविधि की सेवाएं अपने में व्यक्तिगत कार्यक्रम नहीं हैं, बल्कि वे कलीसिया के समारोह हैं, जो “एकता के संस्कार” हैं, अर्थात, ईश्वर की पवित्र प्रजा अपने धर्माध्यक्षों के द्वारा एकता में और व्यवस्थित रहते हैं। अतः धर्मविधि की सेवाएँ पूरी कलीसिया के शरीर का अंग हैं, जो उसे अभिव्यक्ति करती और उस प्रभावकारी बनाती हैं।” (सक्रोसंतुम कोनचीलियुम 26)।
संत पापा ने कहा कि अतः यह याजकों, धर्माध्यक्षों और हरएक पुरोहित का उत्तरदायित्व है कि एक धर्मविधि की सुरक्षा की जाये और उसे बढ़ावा दिया जाये, जिससे उसके नियमों के सम्मान में, वह सरलता में चमके और इस तरह एक, पवित्र, काथलिक और प्रेरितिक कलीसिया को अभिव्यक्त करे। एक ऐसी धर्मविधि अपने में सुसमाचार प्रचार का एक मूलभूत माध्यम होगा, कृपा का साधन जिसके द्वारा जैसे की धर्मसभा हमें शिक्षा देती है, हम अपने को समर्पित करना सीखते हैं, और ख्रीस्त के माध्यम, हम ईश्वर और अपने बीच में एकता की पराकाष्ठा तक पहुंचते हैं।
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