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सांता मरिया देली आंजेली महागिरजाघर के प्राँगण में युवाओं के साथ मुलाकात करते संत पापा लियो 14वें सांता मरिया देली आंजेली महागिरजाघर के प्राँगण में युवाओं के साथ मुलाकात करते संत पापा लियो 14वें  (ANSA)

असीसी में पोप : प्यार की सभ्यता का निर्माण करें, विभाजन का नहीं

पोप लियो 14वें ने अपने प्रेरितिक दौरे के पहले पड़ाव, सांता मारिया देली अंजेली (दूतों की संत मरिया) में, युवाओं के सवालों के जवाब दिए और समझाया कि सुसमाचारी मूलसिद्धांत “कट्टरपंथ के बिल्कुल उल्टा है: यह हमें अंधा और हिंसक नहीं बनाता, बल्कि संवेदनशील और विनीत,” एवं सभी का स्वागत करनेवाला बनाता है।

अंतोनेला पलेरमो

असीसी, आज संत फ्रांसिस असीसी की आध्यात्मिक विरासत को कैसे जिया जा सकता है? हम एक ऐसी दुनिया में सेवा और स्वागत की भावना को कैसे अपना सकते हैं जो लगातार जुल्म और उपभोक्तावाद से प्रभावित हो रही है? और हम एक ऐसी कलीसिया पर कैसे भरोसा करते रह सकते हैं जो खुद संकटों और उलझनों से घिरी हुई है?

ये ही सवाल थे जो तीन युवाओं ने पोप से पूछा, जिन्होंने न केवल अपनी पीढ़ी की, बल्कि कई अन्य लोगों की भी चिंताओं को आवाज दी।

पोप लियो ने असीसी के उम्ब्रियन शहर में अपने प्रेरितिक दौरे की शुरुआत सांता मारिया देली अंजेली (दूतों की संत मरिया) में युवाओं से मिलकर की। उनके हर सवाल का विस्तार से जवाब देते हुए, उन्होंने कई खास सिद्धांतों को दोहराया: धर्म का कभी भी राजनीतिक मकसद के लिए इस्तेमाल नहीं किया जाना चाहिए, जबकि नेतृत्व आजादी देनेवाला, जिम्मेदार और सबको साथ लेकर चलनेवाली होनी चाहिए।

धारा के विपरीत जाना: यादों को ठीक करना और मेल-मिलाप को बढ़ावा देना

ज़ाग्रेब की करोलिना ने पूछा कि लोग मसीह के असली शिष्य कैसे बने रह सकते हैं और एक जीवंत विश्वास कैसे साझा कर सकते हैं जो कलीसिया की दीवारों तक ही सीमित न रहे।

जवाब में, पोप युद्ध विषय पर वापस आए, यह याद करते हुए कि करोलिना “यूरोप के एक ऐसे इलाके से आती हैं जिसने तीस साल पहले युद्ध देखा था, साथ ही धार्मिक संबद्धता और राष्ट्रवाद के खतरनाक ताने-बाने को भी देखा था।”

उन्होंने कहा कि इस इलाके में बातचीत के लिए फ्रांसिस्कन धर्मसंघियों की लंबे समय से चली आ रही प्रतिबद्धता ने काथलिक, ऑर्थोडॉक्स ख्रीस्तीयों और मुसलमानों को शांति से एक साथ रहने में मदद की है। पोप लियो ने कहा कि यही वह रास्ता है जिस पर चलते रहना चाहिए।

“आज, इस सामीप्य की परंपरा के प्रति वफादार रहने का मतलब है धारा के विपरीत जाना, यादों को चंगा करने के लिए काम करना और मेल-मिलाप को बढ़ावा देना। ख्रीस्तीयों को अलग-अलग पहचानों के बीच झगड़ों में धर्म का फायदा उठाने के लिए लुभाए जानेवाले समाजों में शांति निर्माता बनने के लिए बुलाया जाता है।”

गलत जानकारी और भेदभाव डर पैदा करते हैं; ख्रीस्त दिल खोलते हैं

पोप ने जोर देकर कहा कि संत फ्रांसिस असीसी के आध्यात्मिक बेटे और बेटियों के रूप में जीने का मतलब है सुसमाचारी मूल सिद्धांत का सही अर्थ समझना।

यह “चरमपंथ के बिल्कुल उल्टा है: यह हमें अंधा और हिंसक नहीं बनाता, बल्कि संवेदनशील और चौकस बनाता है, हमेशा येसु का अनुसरण करता और इसलिए सबके प्रति विनम्र और स्वागत करनेवाला बनाता है। यह आसान नहीं है, लेकिन इससे बहुत खुशी मिलती है।”

पोप ने सुझाव दिया कि इस रास्ते पर चलने का मतलब कभी-कभी असुविधा या पुरानी बातों का चुनाव करना, जबकि हर तरह की हेराफेरी का विरोध करना होता है।

“इसलिए ख्रीस्त का साक्ष्य देना दिलचस्प और मुश्किल दोनों है, क्योंकि यह हमारे मन और दिल को बनावटी घेरे से बाहर खोलता है—यानी, गलत जानकारी और भेदभाव की दीवारों से पैदा हुए डर से परे।”

तकनीकी भूलवा देती है कि हम एक साथ रहें

पोप लियो ने संत फ्रांसिस की इस समझ पर चिंतन किया कि गरीबी लोगों को करीब ला सकती है, भले ही वे बहुत दूर लगें।

उन्होंने याद दिलाया कि कलीसिया होने का क्या मतलब है: एक ऐसा घर जो सबके लिए खुला हो, एक ऐसा समुदाय जो सुनता हो और भाईचारे की खुशी महसूस करता हो। यह एक ऐसी जगह भी है जहाँ लोग वर्चुवल दुनिया से परे, एक साथ रहने की असलियत को फिर से खोजते हैं, और चुप्पी की कीमत को समझते हैं, जो "अपनी हिंसा, चिल्लाहट और क्रूरता के साथ युद्ध के बिल्कुल विपरीत है।"

"प्यारे युवाओं, एक साथ रहना कितना सुन्दर है और 'ईश्वर के बारे में एवं उनकी रोशनी में, जीवन के बारे में बात करना', उसकी सारी सुंदरता, रहस्य और गंभीरता के साथ!"

"आप जहाँ भी जाएँ, जीने के इस तरीके के गवाह बनें, खासकर ऐसे समय में जब तकनीकी हमें यह भूलवा रही है कि हाड़-मांस के लोगों के रूप में एक साथ कैसे रहना है।"

जीवनभर का समर्पण एक क्रांतिकारी कार्य

बोलोन्या के जोवान्नी ने पोप से प्रश्न किया कि ऐसी दुनिया में जहाँ निकट भविष्य या अनन्त की ओर देखना मुश्किल होता है, वहाँ ईश्वर को पूरे दिल से “हाँ” कहना कैसे मुमकिन हो सकता है।

उन्होंने यह भी पूछा कि रॉबर्ट प्रीवोस्ट (पोप) को अपनी बुलाहट के सफर में किस चीज से मदद मिली।

पोप ने जवाब दिया, “एक पक्का फैसला करना शायद सबसे क्रांतिकारी काम है।”

उन्होंने कहा कि आज की समस्या “स्वतंत्रता के भ्रमित समझ में है”, जो इस भ्रम को बढ़ावा दे सकती है कि “समस्याएँ भाग जाने, दूसरों को धोखा देने, या लगातार बदलते रास्तों पर बिना ज्यादा दूर गए, कुछ ही कदम चलने से हल हो सकती हैं।”

पोप ने चेतावनी दी कि लगातार नए अनुभव, रिश्ते और चीजों की खोज करना अक्सर अंदर के खालीपन की ओर इशारा करता है। यह लोगों को दूसरों को सामान की तरह समझने पर भी मजबूर कर सकता है। उन्होंने कहा कि सच्चा प्यार बिल्कुल अलग होता है।

“हमेशा के लिए फैसला करने से हम पिंजरे में कैद नहीं हो जाते, बल्कि यह हमें अधिक गतिशीलता के लिए खोलता है। प्यार एक प्रस्थान है, एक रास्ता है जिसे खोजा जाना है, एक सफर है जो ईश्वर हमारे साथ करते हैं। यही हर बुलाहट का असली मतलब है।”

पोप बनने के लिए ‘हाँ’ कहना

जोवन्नी के सवाल से प्रेरित होकर, पोप लियो ने अपने व्यक्तिगत सफर की एक झलक दिखाई।

उन्होंने समझाया कि फैसले को हर दिन नवीनीकृत होना चाहिए और बुलाहट “छुटकारा और चंगा होने का सफर है।” इसके लिए हर दिन के समर्पण और लगातार चौकस रहने की जरूरत है कि पाप किसी इंसान के फैसले पर कैसे असर डाल सकता है।

पोप ने कहा, “मेरे अनुभव से, मैं कह सकता हूँ कि प्रभु ने मुझे कभी अकेला नहीं छोड़ा। वे हमेशा मेरे साथ रहे, और मुझे ऐसे लोग भी दिए जिनके साथ मैं चल सकूँ।” एक पुरोहित, अगुस्तीनी समुदाय का सदस्य और एक मिशनरी बनने के मेरे काम में, मुझे एक रोशनी मिली जिसने आज तक मेरा मार्गदर्शन किया है, जब तक कि मैंने एक बहुत ही खास बुलावे “पोप बनने” के लिए ‘हाँ’ नहीं कहा।

हमारे शहरों को बाँटने वाली अदृश्य दीवारें

सिसिली के 22 साल के लुइजी ने संत पेत्रुस के उत्तराधिकारी की बात मानने के बारे में प्रश्न किया, खासकर जब यह मुश्किल लगता है या जब कलीसिया के अंदर कलंक सामने आते हैं। उन्होंने पूछा कि लोग “इस चंगा करनेवाले प्यार” के अंदर कैसे रह सकते हैं?

पोप लियो ने जोर देकर कहा कि एकता येसु के दिल के करीब है। पोप, जिन्होंने एकता को धर्माध्यक्ष के रुप में अपना आदर्शवाक्य का विषय बनाया, इसे “क्रांतिकारी” बताया। उन्होंने कहा कि कलीसिया की नाकामियों और जख्मों के बावजूद, ऐसी एकता संभव है और दिख भी रही है।

“येसु के आस-पास, ऐसे पुरुष और महिलाएँ जो शायद कभी नहीं मिलते या साथ में समय बिताते, भाई-बहन बन जाते हैं। कलीसिया का यह चमत्कार अभी भी हो रहा है, ईश्वर को धन्यवाद कि यह आज भी हमारे शहरों में आश्चर्यचकित करनेवाला बना हुआ है, जो लोगों को एक-दूसरे से अलग करनेवाली अनदेखी दीवारों से भरे हुए हैं। एक बार जब हम एक-दूसरे को भाई-बहन के रूप में पहचान लेते हैं, तो कितने तरह के भेदभाव और असमानता तुरंत खत्म हो सकते हैं!”

येसु की शक्ति अपमानित नहीं करती, बल्कि ऊपर उठाती है

पोप ने मरिया भजन का हवाला देते हुए समझाया कि सच्ची शक्ति किसी व्यक्ति की खुद पर ध्यान देने की क्षमता से नहीं, बल्कि विनम्रता से दूसरों की सेवा करने की उसकी इच्छा से मापी जाती है।

“लालच करना नहीं, बल्कि ग्रहण करना; पकड़कर नहीं रखना, बल्कि वापस देना: यही ईश्वर का जीवन है, जो कलीसिया को चंगा करता है और उसे एक स्वतंत्र प्रजा बनाता है, एक ऐसी जगह जहाँ लोग सांस ले सकें और मुक्ति पा सकें।”

पोप ने अंत में कहा कि कलीसिया के लिए येसु की इच्छा साफ है: उसे उनका शरीर बनना चाहिए और उनके जीवन को दिखाना चाहिए। इसका मतलब है उनके उदाहरणों पर चलना है और एक अलग तरह की शक्ति का इस्तेमाल करना - जो दूसरों को अपमानित नहीं करती, बल्कि उन्हें ऊपर उठाती है।

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06 अगस्त 2026, 16:39